झारखंड के गढ़वा जिले से पशु तस्करी का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासन और पशुपालन विभाग दोनों की नींद उड़ा कर रख दी है। इस मामले में पुलिस छापेमारी के दौरान करीब 150 गोवंश को तस्करों के चंगुल से मुक्त कराया गया है, लेकिन हैरत करने वाली बात यह है कि इन सभी पशुओं के कानों में 'पीले रंग के सरकारी टैग' लगे हुए हैं।
गढ़वा: झारखंड के गढ़वा जिले से पशु तस्करी का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासन और पशुपालन विभाग दोनों की नींद उड़ा कर रख दी है। इस मामले में पुलिस छापेमारी के दौरान करीब 150 गोवंश को तस्करों के चंगुल से मुक्त कराया गया है, लेकिन हैरत करने वाली बात यह है कि इन सभी पशुओं के कानों में ‘पीले रंग के सरकारी टैग’ लगे हुए हैं।
क्या है पूरा मामला?
गुप्त सूचना के आधार पर की गई इस कार्रवाई में जब पुलिस ने ट्रकों और बाड़ों की तलाशी ली, तो पाया कि बड़ी संख्या में गायों और बैलों को गैरकानूनी रूप से ले जाया जा रहा था। सामान्य तौर पर ये टैग केंद्र और राज्य सरकार की उन योजनाओं के तहत लगाए जाते हैं जिनमें किसानों को सब्सिडी पर दुधारू पशु दिए जाते हैं या जिनका बीमा किया जाता है।
प्रशासनिक मिलीभगत की आशंका
पशुओं के कानों में लगे इन टैग्स ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, क्या सरकारी सब्सिडी पर दिए गए पशुओं को ही तस्करों को बेचा जा रहा है? बिना विभाग के अधिकारियों की जानकारी के इतनी बड़ी संख्या में टैग वाले पशु तस्करी के नेटवर्क में कैसे पहुंचे? क्या यह पशुपालन विभाग और बिचौलियों के बीच किसी बड़े मिलीभगत का हिस्सा है?
पुलिस और विभाग की कार्रवाई
गढ़वा पुलिस ने इस मामले में अज्ञात तस्करों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और जप्त किए गए पशुओं को स्थानीय गौशाला भेज दिया गया है। जिला पशुपालन अधिकारी ने कहा है कि इन टैग्स के यूनिक आईडी नंबर (UID) के जरिए यह पता लगाया जाएगा कि ये पशु किस ब्लॉक और किस किसान को आवंटित किए गए थे। उन्होंने कहा कि “यह एक गंभीर विषय है। टैग लगे पशुओं की तस्करी का मतलब है कि सरकारी रिकॉर्ड में हेराफेरी की गई है। हम उन लाभार्थियों की पहचान कर रहे हैं जिनके नाम पर ये पशु दर्ज थे।”
रिपोर्ट: सुशील कुमार साह