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राकेश टिकैत के आंसुओं ने दिखाया जबदस्त असर

By टीम पर्दाफाश 
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Rakesh Tikaits Tears Showed Tremendous Impact

नई दिल्ली: गणतंत्र दिवस के दिन हंगामे के बाद से खाली खाली चल रहे यूपी गेट पर नजारा बदला हुआ था। एक बार फिर मेरठ एक्सप्रेस वे पर किसानों की भारी भीड़ उमड़़ आई। एक किलोमीटर तक सिमट चुके किसानों ट्रैक्टर और तंबू शुक्रवार को फैलकर करीब दो किलोमीटर तक पहुंच गए। गुरुवार को जिन किसानों ने अपने तंबू उखाड़ने शुरू कर दिए थे, दोबारा से उनपर तिरपाल तनने लगा था। मंच के सामने भी जहां मुश्किल से सौ लोग रह गए थे, शुक्रवार को यह संख्या बढ़ कर हजार के पार हो गई। गुरुवार को पुलिस और प्रशासन की चहलकदमी के बाद से आशंकित किसान अपना सामान समेटने लगे थे।

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लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों के साथ वार्ता विफल होने के बाद राकेश टिकैत के आंसुओं ने माहौल बदल दिया। हालात ऐसे बन गए कि आधी रात से ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तमाम हिस्सों से किसानों के समूह गाजीपुर बॉर्डर की तरफ बढ़ने लगे। जहां धरना खत्म होने की अटकलें लग रही थीं वहां रात में ही भीड़ जुटने लगी। शुक्रवार सुबह तो हरियाणा के फरीदाबाद, पलवल, करनाल, सोनीपत, पानीपत से भी बड़ी संख्या में किसान धरना स्थल पहुंचे। पंजाब और दिल्ली से बड़ी संख्या में किसान प्रतिनिधियों धरना स्थल पहुंच कर आंदोलन को समर्थन देने की घोषणा की।

बड़ी संख्या में किसान रात में ही यूपी गेट के लिए रवाना हो गए। इसके चलते सुबह पौं फटने तक यूपी गेट पर करीब दो किमी का हिस्सा खचाखच भर गया। हालांकि इसमें ज्यादातर किसान आंदोलन को समर्थन करने आए थे। वह कुछ देर रुकने के बाद वापस लौट गए। इसके चलते धरना स्थल पर पूरे दिन किसानों के आने का और जाने का क्रम जारी रहा। कई दिनों के बाद ऐसी स्थिति बनी कि मंच का संचालन लगातार हुआ। बावजूद इसके कई किसान प्रतिनिधियों को बोलने के लिए वक्त नहीं मिल सका। खुद मंच से ही बाकी बचे प्रतिनिधियों को भरोसा दिया किया कि उन्हें शनिवार को जरूर अवसर दिया जाएगा।

बल्कि लिस्ट से ही शनिवार को मंच शुरू किया जाएगा। जो प्रतिनिधि आते जाएंगे, इसी क्रम में उनका नाम भी जुड़ता जाएगा। चूंकि मंच संचालन एक मिनट के लिए भी नहीं रूका, इसलिए नेताओं की बात सुनने के लिए मंच के सामने जमा किसानों को बार बार कहा गया कि वह तमाम लंगरों में जाकर खाते पीते रहें। धरना स्थल पर तमाम तंबुओं में रह रहे किसानों को अंदेशा था कि धरना खत्म हो जाएगा। इसलिए ज्यादातर किसानों ने गुरुवार की शाम को ही अपना बोरिया बिस्तर बांध लिया था।

लेकिन सुबह एक बार फिर सबके बिस्तर खुले नजर आए। बल्कि एक बार फिर से तंबुओं में गणतंत्र दिवस से पहले के हालात नजर आए। वहीं कई जगह भांग के भी लंगर चल रहे थे। इन लंगरों में जूस के साथ गोला वितरित किया जा रहा था। धरना स्थल पर भीड़ का असर लंगरों की व्यवस्था पर भी पड़ा। तमाम लंगरों में ऐसे हालात बन गए कि तैयार खाद्य सामग्री कम पड़ने लगी। ऐसे में खाने पहुंचे लोगों को प्लेट हाथ में लेकर इंतजार करना पड़ गया।

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