कर्नाटक विधानसभा में राज्यपाल थावरचंद गहलोत राज्य सरकार द्वारा तैयार किया गया पूरा भाषण पढ़े बिना ही विधानसभा से बाहर चले गए। राज्यपाल ने विधानसभा के संयुक्त सत्र में अपने पारंपरिक भाषण की सिर्फ पहली और आखिरी लाइनें पढ़ने के बाद विधानसभा से चले गए। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा है कि राज्य सरकार राज्यपाल के इस रवैये का विरोध करेगी और गहलोत के इस कदम पर सुप्रीम कोर्ट जाने पर विचार करेगी।
नई दिल्ली। कर्नाटक विधानसभा (karnataka assembly) में राज्यपाल थावरचंद गहलोत (Governor Thawarchand Gehlot) राज्य सरकार द्वारा तैयार किया गया पूरा भाषण पढ़े बिना ही विधानसभा से बाहर चले गए। राज्यपाल ने विधानसभा के संयुक्त सत्र में अपने पारंपरिक भाषण की सिर्फ पहली और आखिरी लाइनें पढ़ने के बाद विधानसभा से चले गए। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा है कि राज्य सरकार राज्यपाल के इस रवैये का विरोध करेगी और गहलोत के इस कदम पर सुप्रीम कोर्ट (supream court) जाने पर विचार करेगी। कांग्रेस नेता बीके हरिप्रसाद ने विधानसभा गेट पर राज्यपाल को रोकने की कोशिश की और उनसे भाषण पूरा पढ़ने के लिए कहा, लेकिन गहलोत ने यह मांग ठुकरा दी। इस घटना के बाद कांग्रेस विधायकों और एमएलसी ने राज्यपाल के खिलाफ नारे लगाए और इस कृत्य की निंदा की।
कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खड़गे (Karnataka Minister Priyank Kharge) ने राज्यपाल के इस कदम के पीछे के तर्क पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या राज्यपाल का कार्यालय (Governor’s Office) भाजपा का कार्यालय बन गया है। अनुच्छेद 176 और 163 का उल्लंघन कौन कर रहा है? हमने अपने राज्यपाल के भाषण में जो कुछ भी कहा है, वह सब तथ्य हैं और उसमें एक भी झूठ नहीं है। फिर भी राज्यपाल इसे पढ़ना नहीं चाहते। खड़गे ने कहा कि इस भाषण को राज्यपाल का संवैधानिक कर्तव्य बताया और कहा कि भाषण में केवल राज्य के हित के मामले शामिल थे, जो पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने पेश किए जा चुके हैं। ऐसा करना उनका संवैधानिक कर्तव्य है। मुझे नहीं पता कि वह इससे पीछे क्यों हट रहे हैं। अगर एक भी पैराग्राफ झूठ या मनगढ़ंत है, तो इसे न पढ़ें। इन 11 पैराग्राफ पर पहले ही जनता में बहस हो रही है। यही पैराग्राफ प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और आरडीपीआर मंत्री को सौंपे गए हैं। यह पहले से ही सार्वजनिक डोमेन में है। वह सिर्फ जनता की चिंताओं को बता रहे हैं। अगर उन्हें कर्नाटक के लोगों की परवाह नहीं है, तो वह जहां चाहें जाने के लिए स्वतंत्र हैं। खड़गे ने कहा कि अगर राज्यपाल राज्य की चिंताओं पर भाषण नहीं पढ़ना चाहते हैं, तो भाषण को सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि वे तय कर सकें कि यह तथ्य है या कल्पना। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्यपाल को ऊंचे अधिकारियों से ऐसे कदम उठाने के आदेश दिए जा रहे हैं और उनकी आज़ादी पर सवाल उठाया। राज्य के कानून मंत्री एचके पाटिल (Law Minister HK Patil) ने इसे लोकतंत्र के इतिहास में एक काला दिन बताया। पाटिल ने कहा कि एक राज्यपाल जिसे संविधान का संरक्षक माना जाता है, वह अपना कर्तव्य निभाने में नाकाम रहा है।