अनंत ब्रह्मांड के विस्तार में घूमती हमारी पृथ्वी और सौर मंडल सिर्फ ग्रहों का जमावड़ा भर नहीं हैं, बल्कि यह ऊर्जा और चेतना का एक ऐसा ताना-बाना है जिसकी परतें विज्ञान और पौराणिक आस्थाओं के बीच बड़ी खूबसूरती से मिलती हैं।
लखनऊ। अनंत ब्रह्मांड के विस्तार में घूमती हमारी पृथ्वी और सौर मंडल सिर्फ ग्रहों का जमावड़ा भर नहीं हैं, बल्कि यह ऊर्जा और चेतना का एक ऐसा ताना-बाना है जिसकी परतें विज्ञान और पौराणिक आस्थाओं के बीच बड़ी खूबसूरती से मिलती हैं।
जब नासा के वॉयेजर 1 और वॉयेजर 2 अंतरिक्ष यान दशकों की यात्रा के बाद सौर मंडल की अंतिम सीमाओं पर पहुँचे, तो उन्होंने जिस ‘हेलियोस्फीयर’ का खाका तैयार किया, उसने दुनिया भर के विचारकों को चौंका दिया। यह सीमा, जो सूर्य से निकलने वाली प्रचंड सौर पवनों और अंतरतारकीय अंतरिक्ष के कॉस्मिक दबाव के टकराने से बनती है, सामने से एक वृत्ताकार ढाल और पीछे एक लंबी खिंची हुई पूंछ जैसा आकार लेती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो जब कोई पिंड अत्यधिक तीव्र गति से किसी माध्यम में आगे बढ़ता है, तो भौतिकी के नियमों के अनुसार उसके आसपास की सुरक्षात्मक परत इसी तरह की जल-बूंद या अंडाकार आकृति धारण कर लेती है। लेकिन जब इस वैज्ञानिक 3 डी मॉडल को वैश्विक मंचों पर देखा गया, तो पहली ही नज़र में भारतीय मनीषा को इसमें एक चिर-परिचित रूप दिखाई दिया; एक दिव्य शिवलिंग का आकार!!
यहीं से शुरू होता है विज्ञान और पौराणिक रहस्यों का वह सम्मोहक संगम, जो केवल कोरी कल्पना नहीं लगता बल्कि यथार्थ की ठोस धरातल पर खड़ा दिखता है। पौराणिक दर्शन में ‘शिव’ का अर्थ है वह जो ‘अव्यक्त और अनंत’ है, और ‘लिंग’ का अर्थ है ‘प्रतीक’। वैदिक ग्रंथों और स्कंद पुराण में ब्रह्मांडीय ऊर्जा के मूल स्रोत को ‘ज्योतिर्लिंग’ कहा गया है, जिसका न कोई आदि है और न कोई अंत।
यदि हम इस पौराणिक दृष्टि को आधुनिक खगोल विज्ञान के चश्मे से देखें, तो यह समानता महज़ एक संयोग नहीं लगती। सूर्य, जो हमारे सौर मंडल की रीढ़ है, अपनी ऊर्जा रूपी चेतना से इस पूरे मंडल को एक सुरक्षा कवच में बांधे हुए है। यह कवच यानी हेलियोस्फीयर हमें बाहर से आने वाले घातक कॉस्मिक विकिरणों से ठीक उसी तरह बचाता है, जैसे पौराणिक गाथाओं में नीलकंठ शिव ने विषपान करके सृष्टि की रक्षा की थी। अंतरतारकीय जहरीले विकिरणों को रोकती यह सीमा ही वास्तव में इस सौर-परिवार की रक्षा ढाल है।
वॉयेजर 1 और वॉयेजर 2 ने जब दो विपरीत और अलग-अलग दिशाओं में करोड़ों किलोमीटर दूर जाकर इस सीमा को लगभग एक समान दूरी पर छुआ, तो इस वैज्ञानिक तथ्य ने इस विचार को और बल दिया कि हमारा पूरा सौर मंडल एक व्यवस्थित, सुगठित और ज्यामितीय चेतना के भीतर सुरक्षित है। जब सूर्य और उसके सभी ग्रह 828,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से मंदाकिनी के केंद्र की परिक्रमा करते हैं, तो गति और दबाव का यह संतुलन एक ऐसे ऊर्जा रूप का निर्माण करता है जो अनादि काल से हमारे मंदिरों में स्थापित पिंडी और उसकी जलहरी (आधार) का आभास कराती है। मानव मस्तिष्क का यह सहज स्वभाव है कि वह अज्ञात में भी ज्ञात की खोज कर लेता है, जिसे विज्ञान में ‘पेरिडोलिया’ कहा जाता है।
लेकिन अगर इस मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया से परे हटकर देखें, तो यह तथ्य हमें इस सत्य के करीब लाता है कि प्राचीन ऋषियों का ‘सूक्ष्म में ब्रह्मांड’ का दर्शन और आज के खगोलविदों का ‘मैक्रो-कॉस्मिक’ अध्ययन, दोनों एक ही सत्य के दो अलग-अलग छोर हैं।
अंतरिक्ष की गहराई में बना यह विशालकाय आकार हमें याद दिलाता है कि विज्ञान भौतिक सिद्धांतों के माध्यम से जिस सत्य को नापता है, पौराणिक प्रतीक उसी सत्य को रूपक और संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त करते हैं। इस प्रकार, वॉयेजर प्रोब्स द्वारा खोजी गई यह सीमा न केवल भौतिकी के नियमों की विजय है, बल्कि यह इस बात का भी सजीव प्रमाण है कि ब्रह्मांड की मूल संरचना में विज्ञान का गणित और आस्था का सौंदर्य दोनों एक ही सूत्र में पिरोए हुए हैं।
रिपोर्ट : राहुल कुमार गुप्ता