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Hatyaharan Tirtha: ‘हत्याहरण’ तीर्थ क्षेत्र के कुंड में स्नान करने से मिट जाता है हत्या का पाप, जानिए यहां की मान्यताएं

'हत्याहरण' नाम दो शब्दों से मिलकर बना है-'हत्या' और 'हरण'। कहा जाता है कि, इस कुंड या सरोवर में स्नान करने से अनजाने में हुई हत्या का पाप भी धूल जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान श्री राम ने लंकापति रावण का वध किया था, तो उन पर ब्रह्म हत्या का दोष लगा था।

By शिव मौर्या 
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Hatyaharan Tirtha: उत्तर प्रदेश के हरादोई जिले के अतरौली क्षेत्र में एक ‘हत्याहरण’ तीर्थ क्षेत्र स्थित है। इस धार्मिक क्षेत्र की कई मान्यताएं हैं। राजधानी लखनऊ इस धार्मिक स्थल की दूरी लगभग 80 किलोमीटर है। सड़क मार्ग से यहां पहुचने में आपको केवल दो से ढाई घंटे का समय लगता है।

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क्या है इस तीर्थ की खासियत?
‘हत्याहरण’ नाम दो शब्दों से मिलकर बना है-‘हत्या’ और ‘हरण’। कहा जाता है कि, इस कुंड या सरोवर में स्नान करने से अनजाने में हुई हत्या का पाप भी धूल जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान श्री राम ने लंकापति रावण का वध किया था, तो उन पर ब्रह्म हत्या का दोष लगा था। अपने इस पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान राम ने भारत के कई धार्मिक स्थलों का भ्रमण किया। अंत में, जब उन्होंने इस पावन कुंड में स्नान किया, तो वे ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्त हुए। तभी से इस स्थान का नाम ‘हत्याहरण तीर्थ’ पड़ा।

इस तीर्थ का जन्म कैसै हुआ ?
शिव पुराण के अनुसार, सतयुग में भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती शांत एकांत स्थान की खोज में निकले और नैमिषारण्य क्षेत्र के घने जंगल में पहुंचकर तपस्या करने लगे। तपस्या के दौरान जब माता पार्वती को प्यास लगी, तो उस घने जंगल में कहीं पानी नहीं था। तब ऋषियों और देवताओं की प्रार्थना पर भगवान सूर्यदेव ने एक कमंडल जल प्रदान किया। माता पार्वती ने जल पिया और शेष बचा हुआ पवित्र जल ज़मीन पर गिरा दिया। उस तेजस्वी जल से वहां एक पवित्र कुंड (सरोवर) का निर्माण हो गया। भगवान शिव ने इस स्थान का नाम ‘प्रभास्कर क्षेत्र’ रखा था।

तीनो युगों की प्रचालित काथाएं
पुौरा​​णिक और लोक काथाओ के अनुसार, सृष्टि के निर्माण के समय जब स्वयं भगवान ब्रह्मा जी से भूलवश अपनी पुत्री पर कुदृष्टि डालने का पाप हुआ, तो वे पश्चाताप में डूब गए। अपने इस भारी पाप और दोष से मुक्ति पाने के लिए ब्रह्मा जी ने इसी कुंड में स्नान किया था। कहा जाता है कि इस कुंड में पाताल गंगा का जल समाहित किया गया था और सूर्य देव की विशेष कृपा इस जल पर थी।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रेता में मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने जब रावण का बध किया तो भगवान राम को ब्रम्ह हत्या का पाप लगा। तब गुरु के कहने पर भगवान राम ब्रम्ह हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए इस तीर्थ पर आये और स्नान किया। इस तरह से उनके पाप धुले और वो ब्रम्ह हत्या के पाप से मुक्त हुए। त्रेता युग से आज तक इस स्थान को हत्या हरण कहा जाता है क्योंकि यहां स्नान करने से ह्त्या तक का पाप नष्ट हो जाता है।

द्वापर युग मे पांडवो ने न सिर्फ इस कुंड में स्नान करके अपने पापों का नाश किया, बल्कि स्नान के बाद पांचों भाइयों ने मिलकर यहां भगवान शिव के अति-प्राचीन ‘पंचमुखी साकार रूप’ मंदिर की स्थापना भी की थी। मान्यता है कि आज भी यहां कुंड स्नान के बाद पंचमुखी महादेव के दर्शन करने से हर मनोकामना पूरी होती है।

यहां हर साल भादों (भाद्रपद) महीने के रविवार के दिन एक बहुत बड़ा और भव्य मेला लगता है। इस मेले में उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु आते हैं। लोग यहां के पवित्र कुंड में आस्था की डुबकी लगाते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और अपने पापों से मुक्ति की कामना करते हैं। मेले का माहौल बहुत ही भक्तिमय और जीवंत होता है। यहाँ तरह-तरह की दुकानें, झूले और खान-पान के स्टॉल लगते हैं, जो श्रद्धालुओं के साथ-साथ बच्चों के आकर्षण का केंद्र होते हैं।

रिपोर्ट-दीपांजलि मिश्रा

 

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