मिडिल-ईस्ट (Middle East) में जारी जंग का असर अब भारत के कई राज्यों में साफ दिखने लगा है। एलपीजी संकट (LPG Crisis) ने उद्योग से लेकर आम जनजीवन तक को हिलाकर रख दिया है। देश में कमर्शियल एलपीजी (Commercial LPG) की कमी के चलते कपड़ा, मार्बल और केमिकल फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं, जिससे हजारों मजदूर बेरोजगार होकर घर लौटने को मजबूर हैं।
नई दिल्ली। मिडिल-ईस्ट (Middle East) में जारी जंग का असर अब भारत के कई राज्यों में साफ दिखने लगा है। एलपीजी संकट (LPG Crisis) ने उद्योग से लेकर आम जनजीवन तक को हिलाकर रख दिया है। देश में कमर्शियल एलपीजी (Commercial LPG) की कमी के चलते कपड़ा, मार्बल और केमिकल फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं, जिससे हजारों मजदूर बेरोजगार होकर घर लौटने को मजबूर हैं।
गुजरात के सूरत में भी घरेलू रसोई गैस (LPG) की भारी कमी दर्ज की गई है। ब्लैक मार्केट में कीमतों में आग लग गई है, जिसके बाद प्रवासी मजदूरों का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो गया है। कई श्रमिक अपना सारा सामान- बर्तन, चूल्हा, बाल्टी आदि लेकर ट्रेन में सवार होकर गांव लौट रहे हैं। पलायन को मजबूर मजदूरों का कहना है कि गैस की किल्लत की वजह से खाना नहीं बना पा रहे हैं। जब तक गैस की स्थिति सामान्य नहीं होती वो वापस नहीं आएंगे।
देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाली मुंबई में हालात ऐसे हैं कि लोग एक सिलेंडर के लिए लंबी कतारों में खड़े हैं और कालाबाजारी के चलते कीमतें दोगुनी-तीन गुनी हो चुकी हैं। गुजरात के सूरत में भी गैस की भारी किल्लत की वजह से प्रवासी मजदूरों का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो गया है। मजदूरों का कहना है कि जब खाना बनाना ही मुश्किल हो गया है, तो शहर में रहना बेकार है। सरकार के दावों के बावजूद जमीनी हालात गंभीर बने हुए हैं।
राजस्थान में कपड़े से लेकर सेरामिक और मार्बल तक के कंपनियों में कमर्शियल एलपीजी की सप्लाई नहीं होने से इंडस्ट्रियल सप्लाई चेन डिस्टर्ब हो गया है। हज़ारों की तादाद में फैक्ट्रियां बंद हुई हैं, जिससे बड़ी संख्या में मज़दूर बेरोजगार हुए हैं। फैक्ट्रियां बंद होने से कोराना जैसे दौर का डर सताने लगा है, जो मज़दूर बचे भी हैं उनके एलपीजी घरेलू सिलेंडर (Domestic LPG Cylinder) नहीं मिलने से खाने पीने का भी संकट पैदा हो गया है।
अजमेर-सियालदह ट्रेन (Ajmer-Sealdah Train) जैसे ही जयपुर स्टेशन (Jaipur Station) के प्लेटफार्म नंबर तीन पर रुकी मज़दूरों की भारी भीड़ बिहार, यूपी और पश्चिमी बंगाल लौटने के लिए ट्रेन में चढ़ने के लिए मारामारी करने लगे। जयपुर के पास रींगस में बोरोसिल फैक्ट्री (Borosil Factory) में काम कर रहे मज़दूर ने कहा कि फैक्ट्री में कमर्शियल एलपीजी (Commercial LPG) सप्लाई बंद होने से ताला लग गया है। सभी मज़दूर परिवार लेकर घर लौट रहे हैं।
अजमेर-किशनगंज ग़रीब नवाज़ एक्सप्रेस (Ajmer-Kishanganj Garib Nawaz Express) में भी जयपुर के प्लेटफार्म नंबर एक पर यही हालात दिखे। ट्रेन में घुसने के लिये लोग एक दूसरे को मारने पर उतारू है। सभी लोग सामान लेकर लौट रहे हैं। पंकज और अनीस जयपुर के सीतापुरा इंडस्ट्रियल इलाक़े में केमिकल फैक्ट्री में काम करते हैं, जहां तीन दिन पहले मालिक ने फैक्ट्री बंद करने की बात कहकर हिसाब कर दिया। युद्ध कब खत्म होगा पता नहीं, इसलिए सामान लेकर लौट रहे हैं। भारत सरकार और राजस्थान सरकार की तरफ़ से जो हेल्पलाइन दिए गए हैं। उस पर इंडस्ट्री के मालिक फ़ोन कर रहे है तो कहा जा रहा है कि इस तरह के आदेश हमें प्राप्त नहीं हुए हैं।
हेल्पलाइन पर नहीं मिल रही सहायता…
बगरू इंडस्ट्री एसोसिएशन के महासचिव नवनीत झालानी (Navneet Jhalani, General Secretary, Bagru Industries Association) ने कहा कि हेल्पलाइन के नंबर 14435 पर मैंने कॉल किया था। तीसरी बार में कॉल लगी और एक महिला ने उठाया। उनसे जब मैंने पूछा कि इंडस्ट्री को एप्लाई करने के लिए क्या प्रक्रिया रहेगी? कहां अप्लाई करना होगा और एवरेज को साबित करने के लिए किन बिलों की कॉपी देनी पड़ेगी या और कोई व्यवस्था है? इस पर उनका जवाब था कि इंडस्ट्री के लिए तो अभी ऐसी कोई व्यवस्था हुई ही नहीं है। जब मैंने उनसे कल के राज्य सरकार और केंद्र सरकार के आदेशों का हवाला दिया तो उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसे किसी आदेश के बारे में जानकारी नहीं दी गई है। उन्होंने कहा कि हम तो 6:00 बजे सुबह से आकर ड्यूटी पर बैठे हैं और हमको कुछ पता नहीं है।
मुंबई में राशन के लिए नहीं, बल्कि एक अदद सिलेंडर के लिए लोग कतार में खड़े हैं
भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई के किचन्स पर भी असर पड़ा है। मुंबई में राशन के लिए नहीं, बल्कि एक अदद सिलेंडर के लिए लोग कतार में खड़े हैं। संकट का फायदा उठाने वाले कालाबाजारी भी एक्टिव हो गए हैं। आम लोगों का आरोप है कि जो सिलेंडर 900-1000 रुपये में मिलता था, उसके लिए अब 2500 से 3000 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। इतनी भारी कीमत चुकाने के बाद भी सिलेंडर मिल जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं है।
लोकमान्य तिलक टर्मिनस (LTT) स्टेशन पर अपना बोरिया-बिस्तर समेटे खड़े लोगों का कहना है कि सिलेंडर मिल नहीं रहा और बाहर का खाना इतना महंगा हो गया है कि दिहाड़ी की पूरी कमाई पेट भरने में ही निकल जाती है। भूखे मरने से अच्छा है कि अपने गांव लौट जाएं।
पलायन कर रहे लोगों कहना है कि गांव में कम से कम जलावन, लकड़ी और खेत-खलिहान के साधन तो हैं, जहां वे अपना गुजर-बसर कर सकेंगे। अगर अंतरराष्ट्रीय तनाव कम नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में ईंधन की किल्लत और बढ़ सकती है। आम जनता में इस बात को लेकर गहरा आक्रोश है। लोगों की सरकार से बस एक ही मांग है- “युद्ध दुनिया के किसी भी कोने में हो, हमारे घर का चूल्हा नहीं बुझना चाहिए। सरकार को इस कालाबाजारी पर लगाम लगाने और वैकल्पिक आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए युद्ध स्तर पर काम करने की जरूरत है।