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देश के इस मंदिर की ध्वजा का व्यवहार विज्ञान को देता है चुनौती, हमेशा हवा की दिशा के विपरीत है लहराती

क्या आप जानते है? जब भी जगन्नाथ पुरी मंदिर (Jagannath Puri Temple) की बात होती है, सबसे पहले ध्यान उसकी ध्वजा (Flag) पर जाता है। यह सिर्फ़ एक झंडा नहीं है, यह सदियों से चलती आ रही एक जीवित परंपरा है। इस ध्वजा (Flag) से जुड़ी सबसे रहस्यमयी बात यह है कि यह हमेशा हवा की दिशा के विपरीत लहराती है।

By संतोष सिंह 
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पुरी। क्या आप जानते है? जब भी जगन्नाथ पुरी मंदिर (Jagannath Puri Temple) की बात होती है, सबसे पहले ध्यान उसकी ध्वजा (Flag) पर जाता है। यह सिर्फ़ एक झंडा नहीं है, यह सदियों से चलती आ रही एक जीवित परंपरा है। इस ध्वजा (Flag) से जुड़ी सबसे रहस्यमयी बात यह है कि यह हमेशा हवा की दिशा के विपरीत लहराती है। समुद्र के किनारे, तेज़ हवाओं के बीच-फिर भी ध्वजा (Flag)  का व्यवहार विज्ञान को चुनौती देता है।

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पुरी का मंदिर लगभग 45 मंज़िल ऊंचा है। हर दिन एक व्यक्ति, जिसे चुनरा सेवक कहा जाता है, नंगे पांव, बिना किसी आधुनिक सुरक्षा उपकरण के, केवल रस्सियों और अपने आत्मबल के सहारे मंदिर की चोटी तक चढ़ता है और ध्वजा (Flag) बदलता है। न हेलमेट, न हार्नेस, न सेफ्टी नेट। नीचे सैकड़ों फीट की ऊंचाई और ऊपर केवल विश्वास। यह कार्य रोज़ होता है, चाहे चिलचिलाती गर्मी हो, मूसलाधार बारिश, महामारी हो या तूफ़ान।

मान्यता है कि यदि किसी दिन यह परंपरा टूट जाए, ध्वजा न बदली जाए, तो मंदिर 18 वर्षों के लिए बंद हो जाएगा। इसलिए परिस्थितियाँ कैसी भी हों, यह अनुष्ठान नहीं रुकता। इतिहास गवाह है युद्ध, अकाल, बीमारियां आईं और गईं, लेकिन ध्वजा (Flag) हर दिन बदली गई। यह सिर्फ़ नियम नहीं, यह एक व्रत है।

इस ध्वजा को बदलने का अधिकार भी किसी एक व्यक्ति का नहीं होता। इसके लिए विशेष परिवार पीढ़ियों से जिम्मेदारी निभाते आ रहे हैं। ध्वजा की बुकिंग वर्षों पहले से होती है। लोग अपने पूरे परिवार, मित्रों के साथ बारात की तरह ध्वजा (Flag)  लेकर आते हैं। ढोल, नृत्य, भजन और फिर वेद मंत्रों के बीच ध्वजारोहण। बहुत से लोग इस एक अवसर को अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं।

पुरी की ध्वजा (Flag)  हमें यह याद दिलाती है कि कुछ परंपराएं केवल देखने की चीज़ नहीं होतीं, उन्हें जिया जाता है। जहाँ आधुनिक दुनिया सुविधा और सुरक्षा खोजती है, वहीं पुरी की ध्वजा (Flag)  आज भी यह कहती है आस्था में सुविधा नहीं, समर्पण होता है। शायद इसी वजह से पुरी सिर्फ़ एक मंदिर नहीं है। वह एक चेतावनी है कि जब तक परंपरा जीवित है, संस्कृति जीवित है।

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