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योगीराज में कमीशन खोर विनय पाठक को कौन दे रहा है संरक्षण, जांच एजेंसियां आखिरकार अब तक क्यों हैं खामोश?

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने अनेक संबोधनों में आए दिन कहते हैं कि भ्रष्टाचारी जितना भी ताकतवर हो,बचेगा नहीं। यूपी की योगी सरकार जीरा टॉलेंस नीति पर कार्य कर रही है, लेकिन हाल में छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर के कुलपति प्रोफेसर विनय पाठक पर दर्ज मुकदमे और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बीते 15 नवंबर को उनकी जमानत याचिका खारिज कर चुका है।

By संतोष सिंह 
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लखनऊ। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने अनेक संबोधनों में आए दिन कहते हैं कि भ्रष्टाचारी जितना भी ताकतवर हो,बचेगा नहीं। यूपी की योगी सरकार जीरा टॉलेंस नीति पर कार्य कर रही है, लेकिन हाल में छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर के कुलपति प्रोफेसर विनय पाठक पर दर्ज मुकदमे और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बीते 15 नवंबर को उनकी जमानत याचिका खारिज कर चुका है। इसके फैसले के बाद उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध बनता है। कोर्ट के इस फैसले के बाद भी कुलाधिपति व राज्यपाल आनंदी बेन पटेल की अब तक जारी चुप्पी बड़ा सवाल खड़ा कर रही है।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट  फैसले के बाद राजभवन खामोशी पर बड़ा सवाल

कमीशन खोर विनय पाठक के खिलाफ दर्ज मुकदमे ही बता रहे हैं कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं। पूरी कहानी के तह में जाने के पहले देखें दर्ज मुकदमे का मजमुन। एक करोड़ 41 लाख रुपये कमीशन के रूप में कुलपति व उनके करीबी अजय मिश्र के वसूल लेने का आरोप लगाने वाले शिकायतकर्ता ने एफआईआर में लिखवाया है कि बकौल प्रो. विनय पाठक, मैं कुलपति बनवाता हूं। 8 विश्वविद्यालयों में मेरे द्वारा ही कुलपति बनवाया गया है। मुझे उपर तक पैसा देना पड़ता है। मेरे संबंध अधिकारियों व माफियाओं से है। कहीं भी जाओगे तो कोई मदद नहीं मिलेगी। मैं तुम्हारी कंपनी को किसी भी विश्वविद्यालय में काम करने नहीं दूंगा।

इन आरोपों के बाद स्वाभाविक है कि इसमे या तो राजभवन को अंधेरे में रखा गया होगा अथवा राजभवन के कुछ प्रभावी लोग भी इसमे अवश्य शामिल होंगे। यह उस यूपी में हुआ है जिसे उत्तम और विकसित प्रदेश बनाने के लिए योगी मोदी की डबल इंजन की सरकार हाड़ तोड़ मेहनत कर रही है। ऐसे में यदि प्रदेश के विश्वविद्यालयों की यह दशा है तो चिंता की बात है।

यदि इतने गंभीर प्रकरण के सामने आने के बाद भी यह चुप्पी ऐसी ही बनी रहती है तो फिर और ढंग से सोचने की जरूरत होगी। बहरहाल यूपी के विश्वविद्यालयों की वास्तविक दशा के लिए यह एफआईआर अनेक चित्र प्रस्तुत कर रही हैं। अब राजभवन व लोकभवन को सोचना है।

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ऐसे में यह कहा जा सकता है कि कानपुर विवि के कुलपति अभी कमीशन खोर विनय पाठक में दम तो है। अति गंभीर एफआईआर दर्ज होने और इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा बीते नवंबर को ​याचिका खारिज किए जाने के इतने दिन के बाद भी राजभवन में इस प्रकरण पर सन्नाटा है। यदि विनय पाठक ने कहा है कि उन्होंने आठ कुलपति बनवाये हैं और धन ऊपर भी पहुचाया है, जैसा कि एफआईआर में दर्ज है, तो मामला बहुत संगीन लग रहा है। कुलपतियों की नियुक्ति में किसी गिरोह के संलग्न होने की चर्चाएं तो बहुत पहले से चल रही थीं, उस धुएं की आग अब दिख भी रही है।

आगरा विवि में सॉफ्टवेयर और डिजिटलाइजेशन घोटाले की STF ने शुरू की जांच

आगरा के डॉ. भीमराव आंबेडकर यूनिवर्सिटी में घोटालों की फेहरिस्त लगातार बढ़ती जा रही है। अब नया मामला विश्वविद्यालय में सॉफ्टवेयर, स्कैनिंग, कंप्यूटरीकरण और दस्तावेज डिजिटलाइजेशन के मद में करीब 1.01 करोड़ रुपए के भुगतान का है। आरोप है कि पूर्व प्रभारी कुलपति प्रो. विनय पाठक ने अपने चहेतों को टेंडर दिए। अधूरे कार्य पर ही एजेंसी को पूरा भुगतान कर दिया गया। शिकायत के बाद एसटीएफ ने मामले की जांच शुरू कर दी है।

जानें क्या है पूरा मामला?

पूर्व प्रभारी कुलपति प्रो. विनय पाठक ने जनवरी से सितंबर तक पद भार संभाला। इस दौरान सॉफ्टवेयर इंस्टालेशन, चार्ट और दस्तावेज की स्कैनिंग और विभागों के कंप्यूटरीकरण के लिए टेंडर हुआ। आरोप है कि उन्होंने अपने रिश्तेदार को स्कैनिंग का काम दे दिया। इसकी शिकायत विवि के खंदारी परिसर स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के पूर्व निदेशक प्रो. वीके सारस्वत ने एसटीएफ से की। इसको संज्ञान में लेकर एसटीएफ ने विश्वविद्यालय प्रशासन को सात दिसंबर को पत्र लिखकर एजेंसी का नाम, एजेंसी के मालिक और संचालक का नाम, टेंडर का बजट, कार्ययोजना, टेंडर की शर्तें, कितना कार्य हुआ और कितने का भुगतान कर दिया, यह सब जानकारियां मांगी गई हैं।

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एसटीएफ ने शुरू की जांच

विवि के कुलसचिव डॉ. विनोद कुमार सिंह का कहना है कि एसटीएफ ने जो जानकारी और रिकॉर्ड मांगे हैं, उन्हें तीन दिन में उपलब्ध कराने के लिए वित्त अधिकारी और संबंधित प्रभारियों को निर्देश दिए हैं। आईईटी के पूर्व निदेशक प्रो. वीके सारस्वत का कहना है कि विश्वविद्यालय में नियम विरुद्ध अपनी मनमानी करते हुए अनुचित निर्णय लिए। इससे छात्र और विश्वविद्यालय का अहित हुआ। इसे ध्यान में रखते हुए इनकी जांच कराने के लिए शिकायत की।

एसटीएफ इन आरोपों की  करेगी जांच

इट्रेट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड नोएडा को वित्त विभाग, एचआर और स्टोर विभाग को कंप्यूटरीकरण का कार्य दिया था। इसका अधूरा कार्य होने पर भी भुगतान कर दिया। इसका बजट 76 लाख रुपये का था। कार्य समाप्ति का प्रमाणपत्र तलब किया है।

बेबेल टेक्नोलॉजी लिमिटेड को विश्वविद्यालय के दस्तावेज के डिजिटलाइजेशन और स्कैनिंग का कार्य दिया। इसका बजट 25 लाख रुपये है। ये प्रो. पाठक के रिश्तेदार की कंपनी बताई गई है। अधूरे और घटिया कार्य में ही भुगतान किया। कार्य समाप्ति के बाद प्रमाणपत्र मांगा है।

एक जनवरी 2022 में राजा महेंद्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय अलीगढ़ से संबद्ध महाविद्यालयों को संबद्धता स्वीकृत हुई। संबद्धता डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय की ओर से समाप्त कर दी गई। इसके बाद भी आगरा विश्वविद्यालय से संबद्धता दी गई। इसके निरस्तीकरण आदेश की प्रतिलिपि मांगी है।

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डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय से संबद्ध आरबीएस कॉलेज प्रबंध समिति को प्रो. विनय पाठक ने अनुमोदन कर दिया था। बाद में इसे निरस्त किया। इन आदेशों की भी प्रतिलिपि मांगी है।

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