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गाड़ियां ही नहीं लोगों की सेहत पर भी असर कर रहा एथेनॉल, E20 फ्यूल ने बढ़ाई मुसीबत

गाड़ियों के साथ ही एथेनॉल अब लोगों के जीवन पर सीधे असर कर रहा है। एथेनॉल की गाड़ियों से निकलने वाले धुएं से खतरनाक गैस निकल रही है, जिसका असर लोगों की सेहत पर सीधे पड़ रहा है। इसके साथ ही, एथेनॉल बनाने वाली फैक्ट्रियों से भारी मात्रा में गंदा पानी निकलता है।

By शिव मौर्या 
Updated Date

नई दिल्ली। गाड़ियों के साथ ही एथेनॉल अब लोगों के जीवन पर सीधे असर कर रहा है। एथेनॉल की गाड़ियों से निकलने वाले धुएं से खतरनाक गैस निकल रही है, जिसका असर लोगों की सेहत पर सीधे पड़ रहा है। इसके साथ ही, एथेनॉल बनाने वाली फैक्ट्रियों से भारी मात्रा में गंदा पानी निकलता है। अगर इस पानी को बिना साफ किए गए नदियों में छोड़ दिया जाए तो यह पानी ऑक्सीजन को खत्म कर देता है, जिसके कारण भूजल जहरीला बना देता है। इसके कारण जलीय जीवों और फसलों को नुकसान पहुंचता है। वहीं, एथेनॉल बनाने के लिए पानी का खर्च भी काफी बढ़ गया है, जो आने वाले समय में बड़ा संकट खड़ा कर सकती है।

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‘रेड कैटेगरी’ में रखे जाते हैं उद्योग
एथेनॉल प्लांट प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की रेड कैटेगरी में आते हैं। प्रदूषण का स्कोर 60 से ज्यादा होता है। एथेनॉल कारखानों से निकलने वाले खतरनाक उत्सर्जन (जैसे एसिटाल्डिहाइड, फॉर्मेल्डिहाइड और एक्रोलिन) हवा, पानी और मिट्टी को प्रदूषित करते हैं और सेहत के लिए बड़ा खतरा पैदा करते हैं।

पेट्रोल में एथेनॉल ​मिलने से गाड़ियां हो रहीं खराब
लोगों की सेहत के साथ ही गाड़ियों पर भी एथेनॉल का अब असर दिखने लगा है। पेट्रोल में एथेनॉल की मिलावट के बाद गाड़ियां की रफ्तार पर ब्रेक लग गया है और इसका असर माइलेज पर देखने को मिल रहा है। गाड़ियों के पार्टस भी खूब खराब हो रहे हैं। पहले जो कारें 20 किमी/लीटर का माइलेज देती थीं, अब ई20 फ्यूल यानी 20 प्रतिशत एथेनॉल वाले पेट्रोल की वजह से माइलेज अब सीधे 12 से 13 किमी/लीटर हो गया है।

पर्यावरणविदों ने क्या कहा?
पर्यावरणविदों ने इसको लेकर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि, बायोफ्यूल वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को कम करते हैं, लेकिन एथेनॉल का उत्पादन खुद बहुत ज़्यादा प्रदूषण फैलाने वाला हो सकता है। अगर इसे नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह कार्यक्रम कृषि, पानी की उपलब्धता और सार्वजनिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है।

बर्नीहाट बना सबसे ज्यादा प्रदूषित
वहीं, मेघालय और असम की सीमा पर बसा बर्नीहाट इन दिनों पूरी तरह से प्रदूषण की चपेट में है। यहां के लोगों की सेहत पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। कभी बर्नीहाट छोटा कसबा हुआ करता था लेकिन 1990 के दशक के आख़िरी वर्षों में यहां तेज़ी से औद्योगिकीकरण शुरू हुआ और धीरे-धीरे यह पूर्वोत्तर भारत के बड़े औद्योगिक केंद्रों में बदल गया। आईक्यू एयर नाम की एक स्विस संस्था ने यहां के एक इलाक़े (बर्नीहाट) को दुनिया का सबसे प्रदूषित मेट्रोपॉलिटन एरिया बताया। यहां भी एथेनॉल बनाने वाली फैक्ट्रियां हैं।

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पेड़ पौधों के साथ घास पर जमी है काली परत
यहां पर फैक्ट्रियों से निकलता धुआं बर्नीहाट को बुरी तरह से प्रदूषित कर दिया है। पेड़—पौधों के साथ ही घास के मैदान पर काली परत एक तरह से जमी हुई है। यही नहीं, लोगों के घरों की छत, दीवारें, सड़कें यहां तक कि दो दिनों से बंद पड़े चर्च की चारदीवारी के भीतर भी।

लोगों को हो रही कई बीमारियां
बर्नीहाट में फैले प्रदूषण के कारण लोगों को कई तरह की बीमारियां हो रही है। सांस लेने के साथ ही स्कीन से संबंधित रोग लोगों को ज्यादा हो रहे हैं। हालांकि, बीते कुछ महीनों में वहां पर प्रदूषण में कमी आने का दावा किया गया है।

 

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