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नियमों के विरुद्ध सील होने के बाद कैसे खुल जाते हैं मकान से लेकर व्यवसायिक प्रतिष्ठान…लखनऊ अग्निकांड के बाद उठने लगे सवाल

राजधानी लखनऊ में कई जगहों पर अ​क्सर देखने को मिलता है कि, मकान और व्यवसायिक भवनों को एलडीए सील कर देता है। इसके पीछे नियमों के नियमों के विरुद्ध बिल्डिंग बनने का हवाला दिया जाता है लेकिन कुछ समय के बाद वो बिल्डिंगें खुल जाती हैं और उसमें सभी काम शुरू हो जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि, नियमों के विपरित बनने के बाद सील हुई बिल्डिंगें कैसे खुल जाती हैं? क्या इसको लेकर अधिकारी कोई बड़ा खेल खेलते हैं?

By शिव मौर्या 
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हुए अग्निकांड में 15 घरों के चिराग बुझ गए। इसके बाद शुरू हुआ जांच का खेल। जांच में सामने आया कि, जिस बिल्डिंग में आग लगी थी उसे 2016 में ध्वस्तीकरण के आदेश दिए गए थे लेकिन इसके बाद भी बिल्डिंग में व्यवसायिक गतिविधियां हो रहीं थीं। वहीं, इस दर्दनाक हादसे के बाद बिल्डिंग को ध्वस्त करने की बात कही जा रही है। हालांकि, सवाल सिर्फ एक ​बिल्डिंग के ध्वस्त करने का नहीं है। राजधानी लखनऊ में ऐसी कई बिल्डिंगें हैं, जहां नियमों को ताक पर रखकर इस तरह की गतिविधियां चल रही हैं। न उन बिल्डिंगों के पास फायर की एनओसी है न ही कोई सेफ्टी…

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वहीं, राजधानी लखनऊ में कई जगहों पर अ​क्सर देखने को मिलता है कि, मकान और व्यवसायिक भवनों को एलडीए सील कर देता है। इसके पीछे नियमों के विरुद्ध बिल्डिंग बनने का हवाला दिया जाता है लेकिन कुछ समय के बाद वो बिल्डिंगें खुल जाती हैं और उसमें सभी काम शुरू हो जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि, नियमों के विपरित बनने के बाद सील हुई बिल्डिंगें कैसे खुल जाती हैं? क्या इसको लेकर अधिकारी कोई बड़ा खेल खेलते हैं?

सूत्रों की माने तो अगर इसकी जांच सही से हो तो कई बड़े अफसरों की कलई खुल जाएगी। जांच में साफ भी हो जाएगा कि आखिर कैसे नियमों के विरूद्ध सील हुई बिल्डिंगें खुल रही हैं और उसमें कैसे सभी गतिविधियां संचालित हो रही हैं। इस तरह की घटनाओं में सबसे ज्यादा भ्रष्ट अधिकारी जिम्मेदार हैं, जो चंद रुपयों के लिए इस तरह के काम करते हैं। सबसे पहले ऐसे अधिकारियों को चिन्हित कर कार्रवाई की जाए, ताकि भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी किसी और दूसरी इमारत में इस तरह की आग न लगे।

बिल्डिंग मालिक और अफसरों की मिलीभगत हुई उजागर
जिस बिल्डिंग में आग लगी, उसमें मालिक और अफसरों की मिलीभगत भी उजागर हो गयी। बिल्डिंग के मालिक वीरेंद्र शुक्ला ने शुरू से ही खामियों को नजरअंदाज किया। वीरेंद्र ने न तो फायर एनओसी ली और न ही किरायेदारों को इसके लिए बोला। बिल्डिंग के निर्माण में भी नियमों का उल्लंघन किया गया। अवैध बिल्डिंग में आने-जाने का एक ही रास्ता था। इसकी वजह से आग लगने के बाद लोग बाहर नहीं भाग सके।

 

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