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प्रेमानंद महाराज की पदयात्रा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित, दर्शन बंद होने की खबर से भक्तों में छाई मायूसी

वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज (Saint Prem Anand Maharaj) की तबीयत बिगड़ने के चलते उनकी पदयात्रा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई है। साथ ही उनके एकांतिक दर्शन भी फिलहाल बंद कर दिए गए हैं। जिसके बाद देशभर से आए हजारों श्रद्धालुओं में मायूसी छा गई। रविवार देर रात बड़ी संख्या में भक्त महाराज जी के दर्शन के लिए वृंदावन पहुंचे थे, लेकिन रोजाना की तरह तड़के 3 बजे प्रेमानंद महाराज पदयात्रा पर नहीं निकले। उनकी जगह आश्रम के शिष्य पहुंचे और लाउडस्पीकर के जरिए श्रद्धालुओं को जानकारी दी।

By संतोष सिंह 
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मथुरा। वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज (Saint Prem Anand Maharaj) की तबीयत बिगड़ने के चलते उनकी पदयात्रा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई है। साथ ही उनके एकांतिक दर्शन भी फिलहाल बंद कर दिए गए हैं। जिसके बाद देशभर से आए हजारों श्रद्धालुओं में मायूसी छा गई। रविवार देर रात बड़ी संख्या में भक्त महाराज जी के दर्शन के लिए वृंदावन पहुंचे थे, लेकिन रोजाना की तरह तड़के 3 बजे प्रेमानंद महाराज पदयात्रा पर नहीं निकले। उनकी जगह आश्रम के शिष्य पहुंचे और लाउडस्पीकर के जरिए श्रद्धालुओं को जानकारी दी।

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शिष्यों ने बताया कि महाराज जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, इसलिए आज से पदयात्रा स्थगित की जा रही है। साथ ही भक्तों से सड़क किनारे भीड़ न लगाने और व्यवस्था बनाए रखने की अपील की गई। घोषणा के बाद श्रद्धालुओं को बिना दर्शन किए लौटना पड़ा। केली कुंज आश्रम (Keli Kunj Ashram) के अनुसार संत प्रेमानंद महाराज (Saint Prem Anand Maharaj)  पिछले 21 वर्षों से किडनी संबंधी बीमारी से पीड़ित हैं। स्वास्थ्य में अचानक आई परेशानी के कारण डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें आराम दिया जा रहा है।

हालांकि आश्रम की ओर से यह नहीं बताया गया है कि पदयात्रा और दर्शन दोबारा कब शुरू होंगे। महाराज जी के दर्शन न होने से भक्त भावुक नजर आए। श्रद्धालु उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना कर रहे हैं। बता दें कि संत प्रेमानंद महाराज (Saint Prem Anand Maharaj)  रोजाना तड़के केली कुंज आश्रम से करीब डेढ़ किलोमीटर पैदल चलकर सौभरी वन जाते हैं। उनकी पदयात्रा में शामिल होने और दर्शन पाने के लिए हर दिन हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। सामान्य दिनों में करीब 20 हजार भक्त आते हैं।

भक्तों ने की जल्द स्वस्थ होने की प्रार्थना

बाराबंकी से आए श्रद्धालु राजू गुप्ता ने कहा कि उन्हें बताया गया कि स्वास्थ्य कारणों से महाराजजी दर्शन नहीं देंगे। उन्होंने राधा रानी से महाराजजी के जल्द स्वस्थ होने की प्रार्थना की। वहीं एक अन्य श्रद्धालु पुष्पा गुप्ता के मुताबिक, वह परिवार के साथ दर्शन के लिए आई थीं, लेकिन दर्शन नहीं हो सके। उन्हें यह भी नहीं बताया गया कि अब अगली बार दर्शन कब होंगे?

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रोज डेढ़ किलोमीटर पैदल चलते हैं प्रेमानंद महाराज

बता दें कि संत प्रेमानंद महाराज (Saint Prem Anand Maharaj)  इन दिनों रोज रात 3 बजे केली कुंज आश्रम से सौभरी वन तक पदयात्रा करते थे। वह करीब डेढ़ किलोमीटर पैदल चलते थे। उनकी पदयात्रा और दर्शन के लिए हर रात हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। सामान्य दिनों में करीब 20 हजार भक्त दर्शन के लिए आते हैं, जबकि वीकेंड और विशेष पर्वों पर यह संख्या लाखों तक पहुंच जाती है।

13 साल की उम्र में छोड़ दिया था घर

संत प्रेमानंद महाराज (Saint Prem Anand Maharaj)  का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले की नरवल तहसील के अखरी गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम शंभू नारायण पांडे और माता का नाम रामा देवी है। तीन भाइयों में वह मंझले हैं। बचपन में उनका नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था। बचपन से ही उनका झुकाव अध्यात्म की ओर था। उन्होंने कक्षा 8 तक पढ़ाई की। बचपन में उन्होंने अपने दोस्तों के साथ शिव मंदिर के लिए चबूतरा बनाने की कोशिश की, लेकिन विरोध होने पर उनका मन टूट गया और उन्होंने घर छोड़ने का फैसला कर लिया। उन्होंने गुरु गौरी शरण जी महाराज से गुरुदीक्षा ली। फिर वह मथुरा आ गए।

कैसे बने राधावल्लभी संत?

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वृंदावन आने के बाद प्रेमानंद महाराज (Saint Prem Anand Maharaj)  रोज बांके बिहारी जी के दर्शन करने लगे। धीरे-धीरे उनका मन राधावल्लभ संप्रदाय (Radhavallabh Sampradaya) की भक्ति में रम गया। एक दिन उन्होंने एक संत को श्री राधारससुधानिधि (Shri Radharassudhanidhi) का श्लोक पढ़ते सुना, लेकिन उसका अर्थ समझ नहीं पाए। बाद में वृंदावन परिक्रमा (Vrindavan Parikrama) के दौरान एक सखी को वही श्लोक गाते सुना। श्लोक से प्रभावित होकर उन्होंने उसका अर्थ पूछा। सखी ने कहा कि इस श्लोक को समझने के लिए राधावल्लभी होना जरूरी है। इसी घटना के बाद प्रेमानंद महाराज ने राधावल्लभ संप्रदाय (Radhavallabh Sampradaya) को अपनाया और राधावल्लभी संत बन गए।

 

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