चीनी अर्थव्यवस्था (Chinese Economy) और कैपिटल मार्केट (Capital Market) पर बेबाक राय रखने वाले देश के प्रमुख अर्थशास्त्री गाओ शानवेन (Chinese Economist Gao Shanwen) का 55 वर्ष की आयु में निधन हो गया। चीनी सरकारी मीडिया (Chinese State Media) ने उनकी मौत का कारण बीमारी बताया है।
नई दिल्ली। चीनी अर्थव्यवस्था (Chinese Economy) और कैपिटल मार्केट (Capital Market) पर बेबाक राय रखने वाले देश के प्रमुख अर्थशास्त्री गाओ शानवेन (Chinese Economist Gao Shanwen) का 55 वर्ष की आयु में निधन हो गया। चीनी सरकारी मीडिया (Chinese State Media) ने उनकी मौत का कारण बीमारी बताया है। हालांकि उनकी मृत्यु को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं। गाओ सरकारी निवेश समूह SDIC Securities के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री थे। उन्हें चीन के सबसे प्रभावशाली मैक्रो-इकोनॉमिस्ट्स (Macro-Economists) में गिना जाता था।
गाओ शानवेन ने GDP ग्रोथ के सरकारी आंकड़ों पर उठाए थे सवाल
गाओ शानवेन 2024 के अंत में उस समय सुर्खियों में आए, जब उन्होंने वाशिंगटन में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दावा किया था कि 2021 से 2023 के बीच चीन की वास्तविक GDP वृद्धि औसतन करीब 2 प्रतिशत रही, जबकि सरकार इसे लगभग 5 प्रतिशत बताती रही। उनका कहना था कि उपभोग, रोजगार और रियल एस्टेट से जुड़े आंकड़े आधिकारिक दावों से मेल नहीं खाते।
बयानों के बाद कार्रवाई और सेंसरशिप
रिपोर्ट्स के अनुसार, उनके बयान से चीन का शीर्ष नेतृत्व नाराज हो गया था। इसके बाद उन पर सार्वजनिक रूप से बोलने पर रोक लगा दी गई, उनके लेख, वीडियो और सोशल मीडिया अकाउंट हटाए गए। नवंबर 2025 में उन्हें नौकरी से भी हटा दिया गया और उनका हांगकांग निवेश सलाहकार लाइसेंस भी समाप्त कर दिया गया।
कैंसर से जूझ रहे थे गाओ
मामले से जुड़े सूत्रों के अनुसार, गाओ ने अपने करीबी लोगों को बताया था कि जनवरी 2025 में उन्हें कैंसर होने का पता चला था। लगभग एक वर्ष तक सार्वजनिक जीवन से दूर रहने के बाद उन्होंने सितंबर 2025 में पेकिंग यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में वीडियो संदेश के जरिए संक्षिप्त उपस्थिति दर्ज कराई थी।
चीनी सोशल मीडिया पर लोगों ने उन्हें ‘सच बोलने वाला अर्थशास्त्री’ बताते हुए दी श्रद्धांजलि
गाओ के निधन के बाद चीनी सोशल मीडिया पर लोगों ने उन्हें ‘सच बोलने वाला अर्थशास्त्री’ बताते हुए श्रद्धांजलि दी। कई यूजर्स ने लिखा कि अब केवल “सरकारी लाइन” का समर्थन करने वाली आवाजें ही बची हैं। यह मामला एक बार फिर चीन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आर्थिक आंकड़ों की पारदर्शिता और असहमति के प्रति सरकार के रवैये पर बहस को तेज कर गया है।