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फंदे को चूमा, मौत को ललकारा: आज ही के दिन तीन जांबाजों ने रचा था स्वाधीनता का नया इतिहास

वह ऐतिहासिक तारीख जब भारत के तीन सबसे जांबाज बेटों, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। आज 23 मार्च है। इस बलिदान की याद में आज पूरा देश 'शहीद दिवस' मना रहा है।

By संतोष सिंह 
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नई दिल्ली। वह ऐतिहासिक तारीख जब भारत के तीन सबसे जांबाज बेटों, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। आज 23 मार्च है। इस बलिदान की याद में आज पूरा देश ‘शहीद दिवस’ मना रहा है।

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क्रांति की वो शाम, जिसने हिला दी थी ब्रिटिश साम्राज्य की नींव

आज से ठीक 95 साल पहले, 23 मार्च 1931 की शाम 7 बजकर 33 मिनट पर लाहौर सेंट्रल जेल के भीतर एक ऐसी घटना घटी, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदल दी। ब्रिटिश हुकूमत ने भारत के तीन युवा क्रांतिकारियों—23 वर्षीय भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु— को फांसी दे दी।

नियमों को ताक पर रखकर दी गई फांसी

इतिहासकारों के अनुसार, इन तीनों वीरों को फांसी देने का समय 24 मार्च की सुबह तय किया गया था। लेकिन जेल के बाहर उमड़ती भारी भीड़ और देशव्यापी विद्रोह के डर से घबराई अंग्रेज सरकार ने नियमों को ताक पर रखते हुए तय समय से 11 घंटे पहले ही, यानी 23 मार्च की शाम को ही इन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया।

इंकलाब के नारों से गूंज उठी थी जेल

चश्मदीदों की कहानियों के अनुसार, फांसी के फंदे की ओर बढ़ते हुए इन तीनों क्रांतिकारियों के चेहरे पर रत्ती भर भी डर नहीं था। वे ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे थे और ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ गा रहे थे। फांसी के बाद अंग्रेजों ने गुपचुप तरीके से उनके शवों को सतलुज नदी के किनारे ले जाकर जला दिया था, लेकिन यह खबर आग की तरह पूरे देश में फैल गई।

क्यों मिली थी फांसी?

इन तीनों पर ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सांडर्स की हत्या का आरोप था। यह हत्या लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए की गई थी, जिनकी मृत्यु साइमन कमीशन के विरोध के दौरान पुलिस की लाठीचार्ज से हुई थी। इसके अलावा, भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ‘बहरी’ ब्रिटिश सरकार को जगाने के लिए दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंका था।

रिपोर्ट: सुशील कुमार साह

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