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‘चलो खेल की धारा कार्यक्रम’ का आयोजन: डाॅ0 कनिष्क पाण्डेय बोले-अपनी-अपनी भाषाओं के माध्यम से लोग खेलों सेे जुड़े

हिन्दी भवन, गाजियाबाद में 'चलो खेल की धारा में' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम कई मायनों में अनोखा रहा क्योंकि इसका आयोजन करने वाली संस्था ‘स्पोर्ट्सः ए वे आफ लाईफ’ ने अपने द्वारा किये गये अध्ययन को सार्वजनिक किया। भारत के मदरसों एवं संस्कृत विद्यालायों में पढ़ने वाले बच्चों की खेल में क्या स्थित है, की वस्तुस्थिति से सबको अवगत कराया।

By शिव मौर्या 
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गाजियाबाद। हिन्दी भवन, गाजियाबाद में ‘चलो खेल की धारा में’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम कई मायनों में अनोखा रहा क्योंकि इसका आयोजन करने वाली संस्था ‘स्पोर्ट्सः ए वे आफ लाईफ’ ने अपने द्वारा किये गये अध्ययन को सार्वजनिक किया। भारत के मदरसों एवं संस्कृत विद्यालायों में पढ़ने वाले बच्चों की खेल में क्या स्थित है, की वस्तुस्थिति से सबको अवगत कराया। उत्तर प्रदेश के मदरसों में खेल की गतिविधियों के सम्बंध में किये गये एक अध्ययन के अनुसार कुल पंजीकृत मदरसों की संख्या लगभग 8106 है जिसमें पंजीकृत छात्रों की संख्या 2275455 हैं।

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यहां खेलों के आयोजन की स्थिति 03 प्रतिशत है। मदरसों में खेलकूद पर निर्धारित (पृथक हेड के रूप में) बजट शून्य है। इन मदरसों में बालक/बालिकाओं के इनहाउस खेलकूद प्रतियोगिताओं के आयोजन संख्या का प्रतिशत लगभग नगण्य है। इसी प्रकार संस्कृत विद्यालय की खेलकूद गतिविधियों के सम्बन्ध में किये गये अध्ययन के अनुसार संस्कृत तथा वैदिक माध्यम से पढ़ने वाले बच्चों की तादाद भी कई लाखों में है जिसमें कुल पंजीकृत छात्रों की संख्या 195853 है तथा कुल वित्त विहीन संस्कृत विद्यालयों की संख्या 1221 है।

संस्कृत विद्यालयों के कितने छात्र-छात्राओं द्वारा जनपद/राज्य स्तर की प्रतियोगिता में प्रतिभाग किया गया है अथवा कितने छात्र-छात्राओं द्वारा विजय प्राप्त की गयी है, इसकी भी संख्या लगभग नगण्य ही है तथा विद्यालयों में खेल कूद से सम्बंधित किट उपलब्धता केवल 01 प्रतिशत है। पूरे भारतवर्ष के अन्य सभी राज्यों में भी लगभग ऐसी ही स्थिति है। कुल मिलाकर मदरसों एवं संस्कृत विद्यालयों में खेलकूद को लेकर न तो कोई नीति है और न ही कोई कार्ययोजना है और न ही कोई मोटीवेशन है।

डाॅ0 कनिष्क पाण्डेय, अध्यक्ष, स्पोर्ट्स ए वे आफ लाईफ द्वारा अवगत कराया गया कि यदि देश में खेल संस्कृति को विकसित करना है और स्पोर्ट्स में सुपर पावर बनना है तो किसी भी पोटेंशियल टारगेट को इग्नोर नहीं किया जा सकता है। यह नहीं कहा जा सकता है कि इन विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों में स्पोर्ट्स आदि की क्षमता नहीं है। इन संस्थानों को खेलों की धारा में लाने की शुरूआत की जा रही है। डाॅ0 कनिष्क ने आगे कहा कि बच्चों को 04 या 05 वर्ष की आयु से ही खेलों में पढ़ाई की तरह से ही परिचित कराना शुरू करना होगा। हिन्दी और अंग्रेजी में क्रमशः खेल प्रवेशिका तथा Know Sports के साथ इसका पहला सफल प्रयोग किया जा चुका है।

मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे उर्दू भाषा से जुड़े होने के कारण उसी भाषा में स्पोर्टस से परिचित हों, इसके लिए ‘खेल कायदा’ नाम से उर्दू में पुस्तक तैयार की गयी है। इसी प्रकार संस्कृत विद्यालयों में संस्कृत भाषा से पढ़ने वाले बच्चों के लिए संस्कृत में ही ‘क्रीड़ा परिचारिका’ तैयार की गयी है। यही नहीं बच्चों को पढ़ाने वाले उर्दू एवं संस्कृत के अध्यापक भी अपनी भाषा में खेल से जुड़े, इसके लिए उर्दू में ‘खेल सफा’ किताब तथा संस्कृत में ‘क्रीड़ा एका जीवन पद्धति’’ तैयार की गयी है जिसका विमोचन हो रहा है। खेलों से जो जिस भाषा के माध्यम से जुड़ना चाहे, उसकी उपलब्धता होनी चाहिए।

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भाषा के वैरियर से खेलों की प्रगति प्रभावित न हो यह इस कार्यक्रम की थीम है। यही नहीं अलग-अलग भाषा के पतवार से खेलों की नाव धारा में बह चले यही हमारा मिशन है। इन चारों पुस्तकों का विमोचन आज हिन्दी भवन में अशोक ध्यानचन्द, पूर्व ओलम्पियन, एम.पी. सिंह, मध्यप्रदेश के पूर्व ओलम्पियन मो0 जलालुद्दीन रिजवी तथा जाने माने संस्कृत शिक्षाविद हरे राम मिश्र, जे0एन0यू0 द्वारा द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित डाॅ0 आर0डी0 सिंह तथा भारत सरकार के पूर्व सचिव, विजय शंकर पाण्डेय की गरिमामयी उपस्थिति में इन मदरसों तथा संस्कृत विद्यालयों के बच्चों के द्वारा किया गया।

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