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चुनाव से पहले ‘कैश ट्रांसफर’ का दांव, 5 राज्यों में महिलाओं पर 24,500 करोड़ का फोकस

देश में अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों ने महिलाओं को साधने के लिए बड़ा दांव चल दिया है। पांच में से चार राज्यों में सरकारें सीधे महिलाओं के बैंक खातों में हजारों करोड़ रुपये ट्रांसफर कर रही हैं। कुल मिलाकर करीब 24,500 करोड़...

By हर्ष गौतम 
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डिजिटल डेस्क, पर्दाफाश।  देश में अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों ने महिलाओं को साधने के लिए बड़ा दांव चल दिया है। पांच में से चार राज्यों में सरकारें सीधे महिलाओं के बैंक खातों में हजारों करोड़ रुपये ट्रांसफर कर रही हैं। कुल मिलाकर करीब 24,500 करोड़ रुपये का कैश ट्रांसफर किया जा रहा है, और चुनावी वादा भी यही है कि सत्ता में वापसी पर यह सिलसिला अगले 5 साल तक जारी रहेगा। यह रणनीति अब सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं रही, बल्कि धीरे-धीरे पूरे देश में चुनावी “फॉर्मूला” बनती जा रही है, जहां महिला वोटर्स को सीधे आर्थिक मदद देकर समर्थन हासिल करने की कोशिश हो रही है।

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हर राज्य का अपना मॉडल, लेकिन लक्ष्य एक-महिला वोट

तमिलनाडु में DMK सरकार ने ‘समर पैकेज’ के नाम पर महिलाओं के खातों में 2-2 हजार रुपये ट्रांसफर किए हैं। असम में भारतीय जनता पार्टी सरकार ने बिहू के मौके पर 4-4 हजार रुपये दिए। वहीं केरल की वामपंथी सरकार ‘स्त्री सुखम’ योजना के तहत 10 लाख महिलाओं को हर महीने 1-1 हजार रुपये दे रही है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना में पहले ही बढ़ोतरी कर चुकी है।

4.1 करोड़ महिलाएं लाभार्थी, वोट बैंक पर सीधा असर

इन चारों राज्यों में कुल 4.1 करोड़ महिलाएं इन योजनाओं का लाभ ले रही हैं, जबकि कुल वोटर्स की संख्या करीब 17.89 करोड़ है। यानी लगभग 23% वोटर्स सीधे इन कैश ट्रांसफर योजनाओं से जुड़े हुए हैं जो चुनावी नतीजों को प्रभावित करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

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अब 15 राज्यों में फैल चुका है ट्रेंड

पिछले कुछ सालों में यह ट्रेंड तेजी से बढ़ा है। पहले जहां सिर्फ एक-दो राज्य ऐसी योजनाएं चला रहे थे, अब देश के 15 राज्य महिलाओं को नकद सहायता दे रहे हैं। इन राज्यों में 13 करोड़ से ज्यादा महिलाओं को हर साल करीब 2.46 लाख करोड़ रुपये ट्रांसफर किए जा रहे हैं। यह रकम इन राज्यों के कुल बजट का लगभग 0.7% हिस्सा है।

इकोनॉमी पर दबाव, कई योजनाएं अटकीं

हालांकि, इस मॉडल का दूसरा पहलू भी सामने आ रहा है। जिन राज्यों ने बड़े पैमाने पर कैश ट्रांसफर योजनाएं लागू की हैं, वहां कई विकास परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों को अपने अन्य खर्चों में कटौती करनी पड़ी है, ताकि इन योजनाओं के लिए बजट निकाला जा सके।

चुनाव में ‘गेमचेंजर’ बनीं ये योजनाएं

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हाल के चुनावों में कैश ट्रांसफर योजनाओं का असर साफ दिखा है:

•मध्य प्रदेश: ‘लाड़ली बहना’ योजना से महिलाओं का बड़ा समर्थन मिला
•कर्नाटक: ‘गृह लक्ष्मी’ योजना ने सत्ता बदल दी
•ओडिशा: ‘सुभद्रा’ योजना के बाद नई सरकार
•महाराष्ट्र: ‘लाड़की बहिन’ से मजबूत महिला वोट बैंक
•झारखंड: ‘मैया सम्मान’ योजना से हेमंत सोरेन की वापसी

‘फ्री स्कीम’ का भी बढ़ता दायरा

कैश ट्रांसफर के अलावा कई राज्यों में दूसरी मुफ्त योजनाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। तमिलनाडु में मुफ्त फ्रिज, गैस सिलेंडर और लोन माफी जैसी योजनाएं चल रही हैं। केरल में लाखों लोगों को पेंशन दी जा रही है, जिसे बढ़ाकर 2000 रुपये किया गया है। पश्चिम बंगाल में बेरोजगार युवाओं के लिए भी अलग पेंशन स्कीम लागू है।

चुनाव में ‘कैश’ बन रहा बड़ा हथियार

साफ है कि अब चुनावी राजनीति में कैश ट्रांसफर योजनाएं बड़ा फैक्टर बन चुकी हैं। महिला वोटर्स को सीधे आर्थिक लाभ देकर पार्टियां न सिर्फ समर्थन जुटा रही हैं, बल्कि इसे लंबे समय तक बनाए रखने की रणनीति भी तैयार कर रही हैं। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह “कैश फॉर्मूला” कितना कारगर साबित होता है।

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