राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस नीति को अवैध ठहराते हुए अमेरिका के एक फ़ेडरल जज ने सोमवार को रद्द कर दिया, जिसके तहत एच-1बी वीज़ा पर 1 लाख डॉलर की फ़ीस लगाई गई थी। सीबीएसन्यूज़ के मुताबिक़, उन 20 राज्यों के पक्ष में अमेरिकी ज़िला जज लियो सोरोकिन ने अपना फ़ैसला सुनाया, जिन राज्यों ने ट्रंप की ओर से घोषित नई फ़ीस को सितंबर में चुनौती दी थी।
United States: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस नीति को अवैध ठहराते हुए अमेरिका के एक फ़ेडरल जज ने सोमवार को रद्द कर दिया, जिसके तहत एच-1बी वीज़ा पर 1 लाख डॉलर की फ़ीस लगाई गई थी। सीबीएसन्यूज़ के मुताबिक़, उन 20 राज्यों के पक्ष में अमेरिकी ज़िला जज लियो सोरोकिन ने अपना फ़ैसला सुनाया, जिन राज्यों ने ट्रंप की ओर से घोषित नई फ़ीस को सितंबर में चुनौती दी थी। अमेरिकी जज का मानना है कि कांग्रेस की अनुमति के बिना एच-1बी आवेदन पर ट्रंप प्रशासन ने एक लाख डॉलर का टैक्स लगाकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है।पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के नियुक्त किए गए जज ने 42 पन्नों के अपने फ़ैसले में लिखा कि “ऐसी कोई वैधानिक शक्ति नहीं है जो एच-1बी आवेदनों पर 1 लाख डॉलर का टैक्स लागू करने की अनुमति देती हो।” वहीं अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (U.S. Department of Homeland Security) ने एक बयान में जज के फ़ैसले को ‘राजनीतिक विचारों पर आधारित फ़ैसला'(Blatant judicial activism) बताया और ट्रंप प्रशासन के आव्रजन सुधारों का बचाव किया।
एच-1बी वीज़ा क्या है?
आपको बता दें कि एच-1बी वीज़ा कार्यक्रम को 1990 में कांग्रेस ने शुरू किया था। अमेरिका में इसके तहत विशेष पेशेवर क्षेत्रों (Specialized professional fields) में विदेशी कर्मचारियों को अधिकतम छह साल तक नियुक्त करने की अनुमति दी जाती है। कांग्रेस ने हर साल 65,000 एच-1बी वीज़ा की संख्या तय की है और इसके अलावा एडवांस्ड डिग्री वाले लोगों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीज़ा (Additional visa) जारी किए जा सकते हैं। इसके तहत कंपनियों को कुछ निर्धारित फ़ीस भी देनी पड़ती है, जो सामान्यत: 1,700 डॉलर से 4,500 डॉलर के बीच होती है। लेकिन पिछले साल ट्रंप के आदेश पर सभी नए एच-1बी आवेदनों में 100,000 डॉलर की फीस जोड़ दी गई। U.S. Citizenship and Immigration Services (USCIS) के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024 में एच-1बी वीज़ा में 71 प्रतिशत लाभार्थी भारत से थे। जबकि चीन से केवल 11.7 प्रतिशत लाभार्थी थे।