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Ram Mandir Donation Scam : ये दो बड़े पदाधिकारी ट्रस्ट को घर की कपंनी की तरह चला रहे थे, हर नियुक्ति में होती थी मनमर्जी

Ram Mandir Donation Scam : राम मंदिर ट्रस्ट को खुद की कंपनी की तरह चलाया जा रहा था। किसको नौकरी पर रखना है, किसको क्या काम देना है? ये सब चंद लोग तय करते थे। इसमें ट्रस्ट के महासचिव, एक सदस्य व एक निर्माण सहायक की भूमिका रहती थी। प्रबंधन के हर कार्य में इन सभी का हस्ताक्षेप रहता था।

By santosh singh 
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Ram Mandir Donation Scam : राम मंदिर ट्रस्ट को खुद की कंपनी की तरह चलाया जा रहा था। किसको नौकरी पर रखना है, किसको क्या काम देना है? ये सब चंद लोग तय करते थे। इसमें ट्रस्ट के महासचिव, एक सदस्य व एक निर्माण सहायक की भूमिका रहती थी। प्रबंधन के हर कार्य में इन सभी का हस्ताक्षेप रहता था। पूरी मनमर्जी चलती थी। कोई अन्य इसमें हस्ताक्षेप करे तो वह बर्दाश्त नहीं होता था। यही वजह है कि खेल पर खेल होते गए और चंद लोग मौज करते रहे। आंखों के सामने से चढ़ावा गायब होता रहा और कमीशन का खेल होता रहा।

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फरवरी 2020 को ट्रस्ट का गठन किया गया था। फिर मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। 2024 में मंदिर का उद्घाटन हुआ। इस दौरान व इसके बाद जो भी कार्य मंदिर से जुड़े हुए उनमें सबसे अधिक भूमिका महासचिव चंपत राय, सदस्य अनिल मिश्रा के साथ निर्माण सहायक गोपाल राव की रही। ट्रस्ट के इन सभी पदाधिकारियों ने एक के बाद अपने रिश्तेदारों को मंदिर प्रबंधन से जोड़ा। फिर इन सभी अपने करीबियों को जोड़ते गए। एक तरह से ट्रस्ट को खुद की कंपनी बना दी। जिसको चाहा नौकरी देते रहे। यही नहीं मनचाही ड्यूटी भी इन लोगों को सौंपी गई। इसका सबसे बड़ा उदाहरण टिन्नू यादव रहा जो ड्राइवर होकर दान की राशि की गणना व चढ़ावे का हिसाब किताब देखता रहा। अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तरह से ट्रस्ट को मजाक बना दिया गया।

टिन्नू के पास रहती थीं चाबियां

मामूली कर्मचारी टिन्नू यादव का गणना प्रक्रिया में सबसे अहम जिम्मेदारी दी गई थी। यहां तक कि दान पात्रों की चाबियां उसके पास रहती थी। वहीं जिस कमरे में गिनती होती थी वहां की भी चाबी उसके पास रहती थी।

आखिर अन्य पदाधिकारियों ने क्यों नहीं दिया दखल

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ट्रस्ट में कुल 14 पदाधिकारी (पदेन मिलाकर) हैं। सवाल उठता है कि आखिर अन्य सदस्यों ने इसमें दखल क्यों नहीं दिया। उनका हस्ताक्षेप न करना दो तीन पदाधिकारियों के लिए संजीवनी बन गया। चंपत राय, अनिल मिश्र व गोपाल राव जो करते रहे वह होता गया। क्योंकि कई मामले पहले भी सामने आए, अगर उसी समय सख्ती की जाती तो शायद ऐसी नौबत नहीं आती।

अब बदलाव की चर्चा, डीएम के हाथ कमान

निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र भी कह चुके हैं कि गाइडलाइन का सिर्फ दस फीसदी ही पालन हुआ। अगर ऐसा हुआ तो अन्य पदाधिकारियों की जिम्मेदारी थी कि व्यवस्था में दखल देते। जिससे उसको सुधारा जाता लेकिन ऐसा नहीं किया गया। हालांकि अब चर्चा है कि जिन पर सवाल उठे हैं उनसे पूरी जिम्मेदारी ले ली गई है। डीएम अयोध्या की निगरानी में प्रबंधन काम कर रहा है। गणना की विशेष निगरानी की जा रही है। जिससे किसी तरह की गड़बड़ियां न हों।

 

 

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