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श्रीमद्भगवद्गीता ने बदल दिया IIT Delhi के गोल्ड मेडलिस्ट का जीवन, 1 करोड़ का पैकेज छोड़ बन गया संन्यासी

आधुनिक जीवन शैली में दुनिया में भौतिकतावाद प्रमुखता से हावी है। हर कोई आज जहां भागमभाग जिंदगी में लोग पैसे कमाने की चाह में बेहताशा दौड़े चले जा रहे हैं। वहीं जब आपको पता चले कि कोई शख्स मोटी रकम वाली नौकरी छोड़ कर संन्यास का राह चुन ली है, तो थोड़ा जरूर अटपटा लगेगा।

By santosh singh 
Updated Date

नई दिल्ली। आधुनिक जीवन शैली में दुनिया में भौतिकतावाद प्रमुखता से हावी है। हर कोई आज जहां भागमभाग जिंदगी में लोग पैसे कमाने की चाह में बेहताशा दौड़े चले जा रहे हैं। वहीं जब आपको पता चले कि कोई शख्स मोटी रकम वाली नौकरी छोड़ कर संन्यास का राह चुन ली है, तो थोड़ा जरूर अटपटा लगेगा। आईआईटी दिल्‍ली (IIT Delhi)  में पढ़ाई के दौरान संदीप कुमार भट्ट (Sandeep kumar Bhatt)  ने श्रीमद्भगवद्गीता गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)  को भी पढ़ा, जिससे उनके जीवन में एक बड़ा परिवर्तन आया।

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28 साल की उम्र 1 करोड़ का पैकेज व जीवन साथी चुनने के बजाय संन्‍यास की राह पर चल पड़े

जी हां, आज हम आज आपको आईआईटी दिल्‍ली (IIT Delhi) से बीटेक डिग्रीधारक गोल्‍ड मेडलिस्‍ट (Gold Medalist) इंजीनियर के संन्‍यासी का मार्ग चुनने की वजह बताने जा रहे हैं। उन्‍होंने एमटेक किया फिर मोटी सैलरी पर जॉब भी की, लेकिन इसके बाद भी उन्हें जीवन में कुछ अधूरा लगा। इसके बाद उन्‍होंने 28 साल की उम्र 1 करोड़ का पैकेज व जीवन साथी चुनने के बजाय उन्होंने संन्‍यास की राह चलने की ठान ली।

आधुनिकता की दौड़ में घट रही है इंसान की क्‍वालिटी

आईआईटी दिल्‍ली (IIT Delhi)  के गोल्‍ड मेडलिस्‍ट संदीप कुमार भट्ट (Sandeep kumar Bhatt)  संन्‍यासी बनने के साथ ही वह स्‍वामी सुंदर गोपालदास हो गए। स्‍वामी सुंदर गोपालदास (Swami Sundar Gopal Das)  ने जोर देते हुए कहा कि ‘पढ़े-लिखे लोगों को साधु-संत बनना चाहिए। गोपालदास ने कहा कि मशीन की क्‍वालिटी तो बढ़ रही है। पर आधुनिकता की दौड़ में इंसान की क्‍वालिटी घट रही है। इसी वजह से हर साल लाखों क्राइम होते हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि इंसान की क्‍वालिटी खराब हो रही है। उन्होंने कहा कि ‘मैं मानता हूं कि पढ़े लिखे लोगों को साधु-संत बनना चाहिए। गोपालदास ने कहा कि आखिर क्‍या वजह है कि बड़ी-बड़ी कंपनी आईआईटी के लोगों हायर करती है? उन्होंने कहा कि अगर अच्‍छाई समाज में बढ़ानी है तो ऐसे लोगों को भी आगे आना चाहिए।

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अगर आप किसी बिगड़े हुए शख्‍स को सुधार दें तो नोबेल पुरस्‍कार से है बड़ा

स्‍वामी सुंदर गोपालदास (Swami Sundar Gopal Das) ने कहा कि जब वह इंजीनियरिंग कर रहे थे तो उन्‍होंने नोटिस किया उनके आसपास इंजीनियर, डॉक्‍टर, आईएएस, न्यायाधीश, वैज्ञानिक व नेता तो बहुत हैं, लेकिन कोई ऐसा व्‍यक्ति नहीं है, जो समाज को अलग तरह की राह दिखा सके। जो लोगों के चरित्र को ठीक कर सके। उन्होंने कहा कि धार्मिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए वह संन्‍यासी बने हैं। उन्‍होंने कहा कि लोग भौतिक सुखों के पीछे लगे रहते हैं। आत्‍महत्‍या, नशे को लेकर भी संदीप कुमार भट्ट उर्फ गोपाल दास (Sandeep Kumar Bhatt alias Gopal Das) ने कई बातें कही। उन्‍होंने कहा इन गलत आदतों को सुधारने के लिए धार्मिक शिक्षा की जरूरत है। उन्‍होंने बताया कि लोगों को इंसान बनना नहीं आता है। लोगों के अंदर सेल्‍फ रेगुलेशन नहीं है।

स्‍वामी गोपालदास (Swami Das) ने  कहा कि नोबेल पुरस्‍कार (Nobel Prize) पाना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन अगर आप किसी बिगड़े हुए शख्‍स को सुधार दें तो यह वाकई बड़ा काम है। लोग नहीं जानते कि लोग कैसे बनें? मनुष्य का कोई आत्म-नियंत्रण नहीं है। उन्होंने कहा कि टूटे हुए व्यक्ति का उत्थान करना बहुत बड़ी बात है।

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