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यह प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि उच्चतम स्तर का राजनीतिक हस्तक्षेप है…अधिकारियों के हटाए जाने पर चुनाव आयोग पर बरसीं ममता बनर्जी

ममता बनर्जी ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, जिस तरह से चुनाव आयोग ने बंगाल को निशाना बनाया है, वह न केवल अभूतपूर्व है, बल्कि बेहद चिंताजनक भी है। चुनाव की औपचारिक अधिसूचना जारी होने से पहले ही मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी, एडीजी, आईजी, डीआईजी, जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षकों सहित 50 से अधिक वरिष्ठ अधिकारियों को मनमाने ढंग से उनके पदों से हटा दिया गया है। यह प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि उच्चतम स्तर का राजनीतिक हस्तक्षेप है।

By शिव मौर्या 
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नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल ​में विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान होने के बाद से वहां का सियासी तापमान काफी बढ़ता जा रहा है। चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में कई बड़े फेरबदल किए। इसको लेकर तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग और भाजपा पर निशाना साधा है।

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ममता बनर्जी ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, जिस तरह से चुनाव आयोग ने बंगाल को निशाना बनाया है, वह न केवल अभूतपूर्व है, बल्कि बेहद चिंताजनक भी है। चुनाव की औपचारिक अधिसूचना जारी होने से पहले ही मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी, एडीजी, आईजी, डीआईजी, जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षकों सहित 50 से अधिक वरिष्ठ अधिकारियों को मनमाने ढंग से उनके पदों से हटा दिया गया है। यह प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि उच्चतम स्तर का राजनीतिक हस्तक्षेप है।

निष्पक्ष रहने के लिए गठित संस्थानों का व्यवस्थित राजनीतिकरण संविधान पर सीधा हमला है। ऐसे समय में जब एक बेहद त्रुटिपूर्ण एसआईआर प्रक्रिया चल रही है और 200 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, आयोग का आचरण स्पष्ट रूप से पक्षपातपूर्ण है और राजनीतिक हितों के प्रति असहज समर्पण दर्शाता है, जिससे बंगाल के लोगों का भविष्य खतरे में पड़ रहा है।

उन्होंने आगे लिखा, पूरक मतदाता सूची अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है, जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की स्पष्ट अवहेलना है, जिससे नागरिक चिंतित और अनिश्चित हैं। इस बीच, सूचना एवं संचार ब्यूरो (आईबी), एसटीएफ और सीआईडी ​​जैसी महत्वपूर्ण एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारियों को चुनिंदा रूप से हटाया जा रहा है और राज्य से बाहर भेजा जा रहा है, जो बंगाल की प्रशासनिक व्यवस्था को पंगु बनाने के एक सुनियोजित प्रयास की ओर इशारा करता है।

भाजपा इतनी बेताब क्यों है? बंगाल और उसके लोगों को इस तरह लगातार निशाना क्यों बनाया जा रहा है? आजादी के 78 साल बाद भी नागरिकों को कतारों में खड़ा करके अपनी नागरिकता साबित करने के लिए मजबूर करने से उन्हें क्या संतुष्टि मिलती है? आयोग की कार्रवाइयों में मौजूद विरोधाभास इसकी विश्वसनीयता के पूर्ण पतन को उजागर करते हैं। आयोग का दावा है कि हटाए गए अधिकारियों को चुनाव संबंधी कार्य नहीं सौंपे जाने चाहिए, फिर भी कुछ ही घंटों के भीतर उन्हीं अधिकारियों को चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में भेज दिया जाता है। सिलीगुड़ी और बिधाननगर के पुलिस आयुक्तों को बिना किसी प्रतिस्थापन की नियुक्ति किए ही पर्यवेक्षक नियुक्त कर दिया गया, जिससे दो महत्वपूर्ण शहरी केंद्र प्रभावी रूप से नेतृत्वहीन हो गए। इस घोर चूक के सामने आने के बाद ही जल्दबाजी में सुधार किए गए। यह शासन नहीं है। यह अराजकता, भ्रम और घोर अक्षमता को अधिकार के रूप में प्रस्तुत किए जाने का प्रतिबिंब है।

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यह कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि यह पश्चिम बंगाल पर जबरदस्ती और संस्थागत हेरफेर के माध्यम से नियंत्रण हासिल करने की एक सोची-समझी साजिश की ओर इशारा करता है। हम जो देख रहे हैं वह अघोषित आपातकाल और राष्ट्रपति शासन का एक अघोषित रूप है, जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों से नहीं बल्कि राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित है। बंगाल की जनता का विश्वास जीतने में विफल रहने के बाद, भाजपा अब जबरदस्ती, धमकी, हेरफेर और संस्थाओं के दुरुपयोग के माध्यम से राज्य पर कब्जा करने का प्रयास कर रही है। मैं पश्चिम बंगाल सरकार के हर अधिकारी और उनके परिवारों के साथ पूरी तरह से एकजुटता से खड़ी हूँ, जिन्हें केवल ईमानदारी और समर्पण के साथ राज्य की सेवा करने के कारण निशाना बनाया जा रहा है। बंगाल ने कभी धमकियों के आगे घुटने नहीं टेके हैं और न ही कभी झुकेगा। बंगाल लड़ेगा, बंगाल प्रतिरोध करेगा और बंगाल अपनी धरती पर विभाजनकारी और विनाशकारी एजेंडा थोपने के हर प्रयास को निर्णायक रूप से विफल करेगा।

 

 

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