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तेल की सप्लाई पर ट्रिपल अटैक! दुनिया में फिर मचेगा कोहराम, भारत पर कितना असर?

हॉर्मुज स्ट्रेट से लेकर बाब अल-मंदेब तक तेल सप्लाई के तीन बड़े रास्तों पर संकट गहराता जा रहा है। सऊदी ने ड्रोन हमलों के बाद अपनी करीब 1200 किमी लंबी पाइपलाइन अस्थायी रूप से बंद कर दी है, जबकि हूती विद्रोहियों की गतिविधियों से बाब अल-मंदेब में भी खतरा बढ़ गया है। अगर ये रास्ते लंबे समय तक प्रभावित रहे, तो वैश्विक तेल सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है और कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं।

By Kalpna Pandey 
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Oil Crisis: एक तरफ हॉर्मुज स्ट्रेट में तेल टैंकरों की आवाजाही पहले ही बुरी तरह प्रभावित है और अब सऊदी अरब ने अपनी बेहद अहम ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन को अस्थायी तौर पर बंद कर दिया है वहीं तीसरी तरफ यमन के हूती विद्रोही बाब अल-मंदेब के बेहद रणनीतिक इलाके में अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं। यानी तेल की सप्लाई के इन तीन अहम रास्तों पर एक साथ खतरा मंडरा रहा है।

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सबसे पहले बात सऊदी की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन की। करीब 1200 किलोमीटर लंबी ये पाइपलाइन सऊदी अरब के लिए हॉर्मुज का बड़ा विकल्प थी। इसके जरिए तेल को फारस की खाड़ी से लाल सागर के रास्ते बाहर भेजा जा सकता है। लेकिन इराक से आए ड्रोन हमलों के बाद सऊदी ने इसे एहतियाती तौर पर बंद कर दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस पाइपलाइन से हाल के महीनों में रोजाना करीब 40 से 50 लाख बैरल तेल तक भेजा जा रहा था।

अब तीसरा मोर्चा और भी चिंता बढ़ा रहा है। यमन के हूती विद्रोही लाल सागर के मुहाने पर मौजूद रणनीतिक पेरिम द्वीप तक पहुंच गए हैं। ये इलाका बाब अल-मंदेब जलडमरू मध्य के बेहद करीब है। अगर यहां समुद्री रास्ता असुरक्षित होता है, तो एशिया और यूरोप के बीच तेल और माल ढुलाई पर बड़ा असर पड़ सकता है। और इस पूरे संकट का असर भारत पर भी पड़ सकता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल और ऊर्जा संसाधनों के आयात से पूरा करता है। अगर खाड़ी से तेल की सप्लाई बाधित होती है या जहाजों को लंबा वैकल्पिक रास्ता अपनाना पड़ता है, तो ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट बढ़ सकती है। इसका असर आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल, महंगाई और देश के इंपोर्ट बिल पर पड़ सकता है। LPG सप्लाई पर भी पहले से दबाव की खबरें सामने आ रही हैं।

और सबसे बड़ा खतरा है तेल की कीमत। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस पूरे संकट के बीच अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच चुकी हैं। अगर हॉरमुज, सऊदी का वैकल्पिक पाइपलाइन रूट और बाब अल-मंदेब—तीनों पर लंबे समय तक दबाव बना रहता है, तो दुनिया के सामने सप्लाई का बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। यानी मामला सिर्फ मध्य पूर्व की जंग का नहीं है मामला उस तेल का है, जिस पर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था चलती है। अब बड़ा सवाल यही है- अगर तेल के ये तीनों रास्ते लंबे वक्त तक प्रभावित रहे, तो क्या दुनिया में फिर से महंगे तेल और महंगाई का कोहराम मचेगा और भारत इस नए ऑयल संकट से खुद को कितना बचा पाएगा?

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