उत्तर प्रदेश के गोंडा में बर्तन व्यापारी विनोद कुमार सहनी की हत्या के बाद मामला अब सियासी रंग ले चुका है। वारदात को लेकर जहां पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं निषाद समाज के वोट बैंक को लेकर बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच राजनीतिक खींचतान भी तेज होती दिखाई दे रही है।
Gonda Murder: गोंडा के कारोबारी विनोद सहनी हत्याकांड के बाद यूपी की सियासत में सिर्फ कानून-व्यवस्था पर सवाल नहीं उठ रहे, बल्कि निषाद वोट को लेकर भी नई बहस शुरू हो गई है। वजह हैं समाजवादी पार्टी की काजल निषाद, जो पुलिस से ही भिड़ गयी।
दरअसल, विनोद सहनी की हत्या के बाद जब काजल निषाद उनके परिवार से मिलने पहुंचीं, तो पुलिस अधिकारी से उनकी तीखी बहस हो गई। काजल निषाद ने आरोप लगाते हुए कहा कि अगर पीड़ित यादव या मुसलमान होता तो अब तक एनकाउंटर और बुलडोजर की कार्रवाई हो चुकी होती। हालांकि पुलिस अधिकारी ने जवाब दिया कि हर मामले में कानून के मुताबिक समान कार्रवाई की जाती है।
गोंडा: कारोबारी विनोद कुमार साहनी की हत्या को लेकर पुलिस कार्रवाई पर सपा नेत्री काजल निषाद ने उठाए सवाल @NavbharatTimes pic.twitter.com/fmSalOxhoM
— NBT Uttar Pradesh (@UPNBT) September 11, 2026
बता दें की, काजल निषाद का राजनीतिक सफर गोरखपुर और पूर्वांचल की सियासत से जुड़ा रहा है। वह सपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुकी हैं और निषाद समाज के बीच अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज करा चुकी हैं। लेकिन बीजेपी के लिए असली चुनौती यहां काजल निषाद से ज्यादा निषाद वोट का समीकरण है।
वहीं उत्तर प्रदेश में निषाद समाज की नाराजगी अब बीजेपी के लिए शुभ संकेत नहीं दे रहे। विनोद सहनी की मौत के बाद निषाद पार्टी के अध्यक्ष और योगी सरकार में मंत्री संजय निषाद खुद धरने पर बैठ गए। पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठे और इसके बाद सपा भी इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमलावर हो गई।
लेकिन सवाल है कि बीजेपी के लिए निषाद समाज इतना अहम क्यों है? दरअसल, पूर्वी यूपी के गोरखपुर, बस्ती, संतकबीरनगर से लेकर मिर्जापुर, भदोही और प्रयागराज तक निषाद, केवट, मल्लाह और बिंद समाज कई सीटों पर चुनावी समीकरण प्रभावित करता है। 2022 में निषाद पार्टी के 6 विधायक भी विधानसभा पहुंचे थे। अब 2027 से पहले अगर आरक्षण, सुरक्षा और गोंडा कांड जैसे मुद्दों पर नाराजगी बढ़ती है, तो इसका सियासी फायदा विपक्ष उठाने की कोशिश करेगा। खास बात ये है कि निषाद पार्टी बीजेपी की सहयोगी है। ऐसे में सवाल सिर्फ वोट का नहीं, गठबंधन के समीकरण का भी है।
हालांकि सिर्फ एक घटना से बीजेपी का वोट बैंक टूट जाएगा, ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन 2027 से पहले अगर ऐसे मुद्दे लगातार सामने आते हैं और विपक्ष इन्हें निषाद समाज के बीच बड़ा मुद्दा बनाने में कामयाब रहता है, तो बीजेपी के लिए पूर्वांचल में समीकरण संभालना आसान नहीं होगा।