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ढह गया वामपंथियों का आखिरी गढ़ : 50 साल में पहली बार खत्म हुआ लेफ्ट का राज, बंगाल,त्रिपुरा और अब केरल भी हाथ से गया

केरल लंबे समय से वामपंथी राजनीति का सबसे मजबूत आधार रहा है। यहां एलडीएफ और यूडीएफ के बीच सत्ता का अदला-बदली का इतिहास रहा है। लेकिन इस बार जनता का रुख अलग दिखाई दे रहा है। रुझानों में यूडीएफ बहुमत के पार पहुंचता नजर आ रहा है, जबकि एलडीएफ काफी पीछे है। 2021 में एलडीएफ ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर इतिहास रचा था, लेकिन इस बार एंटी-इनकंबेंसी और स्थानीय मुद्दों ने उसकी राह मुश्किल कर दी...

By हर्ष गौतम 
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नई दिल्ली।  भारत की राजनीति में 4 मई का दिन एक बड़े बदलाव का संकेत लेकर आया है। केरल विधानसभा चुनाव के रुझानों में कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ गठबंधन स्पष्ट बढ़त बनाता नजर आ रहा है। इसके साथ ही पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला एलडीएफ सत्ता से बाहर होता दिख रहा है। अगर ये रुझान नतीजों में बदलते हैं, तो देश में पहली बार ऐसा होगा जब किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं बचेगी।

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लेफ्ट का आखिरी गढ़ भी ढहने की कगार पर

केरल लंबे समय से वामपंथी राजनीति का सबसे मजबूत आधार रहा है। यहां एलडीएफ और यूडीएफ के बीच सत्ता का अदला-बदली का इतिहास रहा है। लेकिन इस बार जनता का रुख अलग दिखाई दे रहा है। रुझानों में यूडीएफ बहुमत के पार पहुंचता नजर आ रहा है, जबकि एलडीएफ काफी पीछे है। 2021 में एलडीएफ ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर इतिहास रचा था, लेकिन इस बार एंटी-इनकंबेंसी और स्थानीय मुद्दों ने उसकी राह मुश्किल कर दी।

बंगाल से शुरू हुआ पतन, केरल तक पहुंचा असर

भारत में वामपंथी राजनीति का स्वर्णकाल पश्चिम बंगाल से शुरू हुआ था, जहां 1977 से लेकर 2011 तक लेफ्ट का दबदबा रहा। लेकिन 2011 में ममता बनर्जी की अगुवाई में तृणमूल कांग्रेस ने इस लंबे शासन का अंत कर दिया। इसके बाद भी लेफ्ट अपने पुराने जनाधार को वापस नहीं पा सका। बंगाल में लगातार चुनावी हार ने संगठन को कमजोर कर दिया।

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त्रिपुरा में झटका, फिर सिमटती गई ताकत

त्रिपुरा में भी 2018 का चुनाव वामपंथ के लिए बड़ा झटका साबित हुआ, जब भारतीय जनता पार्टी ने 25 साल पुरानी सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। इसके बाद केरल ही एकमात्र राज्य बचा था, जहां लेफ्ट की पकड़ मजबूत थी। अब वहां भी हार की स्थिति साफ है।

राष्ट्रीय राजनीति में भी कमजोर हुआ आधार

एक समय ऐसा था जब वामपंथी दल राष्ट्रीय राजनीति में किंगमेकर की भूमिका निभाते थे। 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने 59 सीटें जीतकर यूपीए सरकार को समर्थन दिया था। लेकिन 2008 में परमाणु समझौते के मुद्दे पर समर्थन वापस लेने के बाद उनकी राजनीतिक ताकत तेजी से घटी। 2009, 2014 और 2019 के चुनावों में उनका प्रदर्शन लगातार कमजोर होता गया।

हार के पीछे क्या हैं कारण?

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राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इस गिरावट के कई कारण हैं। लंबे समय तक सत्ता में रहने से पैदा हुआ असंतोष, नई पीढ़ी के मुद्दों से दूरी, और बदलती राजनीति के साथ खुद को ढालने में कमी—ये सभी कारक लेफ्ट के खिलाफ गए। इसके अलावा विपक्ष की बेहतर रणनीति और जमीनी स्तर पर मजबूत प्रचार ने भी इस बार बड़ा फर्क पैदा किया है।

क्या खत्म हो रही है वामपंथ की राजनीति?

ऐसा नहीं है कि वामपंथ पूरी तरह खत्म हो गया है, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि उसका प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सामाजिक न्याय, मजदूर अधिकार और समानता जैसे मुद्दों की हमेशा जरूरत रहेगी—जो वामपंथ की पहचान रहे हैं। अब असली चुनौती यह है कि वामपंथी दल खुद को नए दौर के हिसाब से कैसे ढालते हैं। क्या वे फिर से जनता के बीच अपनी जगह बना पाएंगे, या यह गिरावट आगे भी जारी रहेगी—यह आने वाला समय तय करेगा।

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