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जगदीशपुर CHC पर 12 वर्षों से जमे हैं चिकित्साधिकारी डॉ. संजय कुमार, तबादला नीति की उड़ाई धज्जियां

यूपी के अमेठी जिले में जगदीशपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में डॉ. संजय कुमार बीते 12 वर्षों से लगातार तैनात हैं। हैरत की बात यह है कि इसी सीएचसी पर रहते हुए वे अधीक्षक के पद पर पदोन्नत भी हो गए हैं। जबकि अन्य चिकित्सकों का समयबद्ध स्थानांतरण होता रहता है।

By santosh singh 
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जगदीशपुर । यूपी के अमेठी जिले में जगदीशपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में डॉ. संजय कुमार बीते 12 वर्षों से लगातार तैनात हैं। हैरत की बात यह है कि इसी सीएचसी पर रहते हुए वे अधीक्षक के पद पर पदोन्नत भी हो गए हैं। जबकि अन्य चिकित्सकों का समयबद्ध स्थानांतरण होता रहता है। वहीं इस केंद्र पर एक ही व्यक्ति की वर्षों की तैनाती और उसी संस्था में पदोन्नति उत्तर प्रदेश की स्थानांतरण नीति 2024-25 को सवालों को घेरे में खड़ा करता है।

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बताते चलें कि उत्तर प्रदेश की स्थानांतरण नीति 2024-25, जिसे राज्य मंत्रिमंडल ने 11 जून 2024 को स्वीकृत किया,जो कि स्पष्ट रूप से निर्देशित करती है कि किसी समूह ‘क’ एवं ‘ख’ के अधिकारी को एक जनपद में अधिकतम 3 वर्ष और मंडल स्तर पर 7 वर्ष से अधिक नहीं रखा जाएगा। इसके अतिरिक्त स्थानांतरण की अधिकतम सीमा समूह ‘क’ और ‘ख’ में 20 प्रतिशत और समूह ‘ग’ और ‘घ’ में 10 प्रतिशत निर्धारित की गई है। इन तबादलों को 30 जून 2024 तक हर हाल में पूर्ण करना था।

अधीक्षक डॉ. संजय कुमार के मामले में ऐसा प्रतीत होता है कि ‘सुशासन’ का दावा केवल कागज़ी बनकर रह गया है। इससे एक बात साफ हो जाती है कि तबादला नीति सिर्फ कागज़ों में लागू है, जबकि धरातल पर कुछ अधिकारियों के लिए नियमों की छूट और संरक्षण उपलब्ध है।

सीएचसी में बाल रोग विशेषज्ञ, रेडियोलॉजिस्ट, डेंटल सर्जन जैसे आवश्यक पद वर्षों से रिक्त हैं। इमरजेंसी सेवाओं में चिकित्सकों की अनुपस्थिति में फार्मासिस्ट मरीजों को देख रहे हैं, और मरीजों को बाहर की महंगी दवाएं लिखी जा रही हैं। इससे गरीब और ग्रामीण जनमानस पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ता है। सूत्रों से यह भी ज्ञात हुआ है कि कुछ चिकित्सक सरकारी आवासों में रहते हुए निजी क्लीनिक भी संचालित कर रहे हैं, जो नीतियों के सरासर उल्लंघन के दायरे में आता है।

प्रश्न यह है कि यदि स्पष्ट शासनादेश, मंत्रिमंडल की सहमति और मुख्यमंत्री का निर्देश भी ज़मीनी स्तर पर प्रभावहीन साबित हो रहा है, तो क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है या फिर प्रभावशाली संरक्षण का मामला? यह मामला न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की गिरती स्थिति का प्रमाण है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे चुनिंदा व्यक्तियों को नियमों से ऊपर रखकर पूरी व्यवस्था को कमजोर किया जा रहा है?

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सरकार यदि वास्तव में नीतियों के पालन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति के प्रति प्रतिबद्ध है, तो यह मामला एक परीक्षण की कसौटी बनकर सामने खड़ा है। जनता की मांग है कि इस मामले में तत्काल उच्च स्तरीय जांच कर, न केवल स्थानांतरण नीति के उल्लंघन की पड़ताल हो, बल्कि जो भी अधिकारी या कर्मचारी संरक्षण में सहयोगी रहे हों, उन पर भी प्रशासनिक कार्रवाई हो।

 

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