देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कामकाज के लिए कानूनी कार्रवाई से मिली व्यापक छूट का मामला अब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने इस छूट को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर मंगलवार को केंद्र सरकार और भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) को नोटिस जारी किया।
नई दिल्ली। देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कामकाज के लिए कानूनी कार्रवाई से मिली व्यापक छूट का मामला अब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने इस छूट को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर मंगलवार को केंद्र सरकार और भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) को नोटिस जारी किया। अदालत के इस कदम से चुनाव आयुक्तों को मिली कानूनी सुरक्षा और उनकी जवाबदेही से जुड़े सवाल फिर चर्चा में आ गए हैं। याचिका में कहा गया है कि इस तरह की व्यापक छूट संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों को सामान्य कानूनी प्रक्रिया से बाहर कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा। यह याचिका मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा की शर्तों और कार्यकाल से जुड़े 2023 के कानून की धारा 16 को चुनौती देती है। मामले की अगली सुनवाई दो नवंबर को होने की संभावना है। इस विवाद का केंद्र वह प्रावधान है, जो पद पर रह चुके या वर्तमान में कार्यरत मुख्य चुनाव आयुक्तों और चुनाव आयुक्तों को आधिकारिक कर्तव्य निभाते समय किए गए काम, कार्रवाई या कही गई बातों के लिए दीवानी और आपराधिक मुकदमों से सुरक्षा देता है।
धारा 16 में क्या प्रावधान है?
इस धारा के अनुसार, कोई भी अदालत ऐसे व्यक्ति के खिलाफ दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं कर सकती और न ही जारी रख सकती, जो मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) या चुनाव आयुक्त है अथवा रह चुका है। यह सुरक्षा उन कामों, कार्यों या बयानों पर लागू होती है, जो उसने अपने आधिकारिक कर्तव्य या जिम्मेदारी निभाते समय किए हों या जिन्हें आधिकारिक कर्तव्य निभाने के तौर पर किया गया हो। इस प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका में इसी व्यापक सुरक्षा पर सवाल उठाया गया है। क्या यह छूट संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है? एडीआर (ADR) का तर्क है कि धारा 16 संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन करती है। याचिका के मुताबिक, इतनी व्यापक कानूनी सुरक्षा मिलने से जवाबदेही कमजोर हो सकती है और कथित मनमानी या भ्रष्टाचार के मामलों की न्यायिक जांच में बाधा आ सकती है। हालांकि, ये याचिकाकर्ता के आरोप और दलीलें हैं। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अभी इन पर अंतिम फैसला नहीं दिया है।
क्या चुनाव आयोग की शक्तियों को लेकर पहले भी सवाल उठे हैं?
पांच अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक अलग याचिका पर केंद्र सरकार, निर्वाचन आयोग और तीनों चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया था। उस याचिका में सवाल उठाया गया था कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था की शक्तियों का इस्तेमाल या उसकी ओर से अकेले प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने दलील दी थी कि आयोग का कामकाज उसे नियंत्रित करने वाले कानून के अनुरूप नहीं है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324 का हवाला देते हुए कहा गया कि चुनावों की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति निर्वाचन आयोग को एक संस्था के रूप में दी गई है, न कि केवल मुख्य चुनाव आयुक्त को व्यक्तिगत तौर पर। इस मामले में भी अदालत ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा था।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले कानून पर भी विवाद क्यों?
वर्ष 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता पर भी न्यायिक जांच चल रही है। विवाद उस व्यवस्था को लेकर है, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर रखा गया है। 23 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की दो न्यायाधीशों की पीठ ने इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को संविधान पीठ के पास भेजने के सवाल पर अलग-अलग राय दी थी। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने बड़ी पीठ के पास मामला भेजने की मांग खारिज की, जबकि न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने इसे संविधान की व्याख्या से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल मानते हुए संविधान पीठ के सामने रखने का समर्थन किया। दोनों न्यायाधीशों ने मामले के कागजात मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (Chief Justice Surya Kant) के समक्ष रखने का निर्देश दिया, ताकि संविधान पीठ गठित करने पर विचार किया जा सके। इस कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री की ओर से नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। इससे पहले मार्च 2023 में अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की अंतरिम व्यवस्था के तहत समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश शामिल थे।