नेपाल के प्राचीन शहर भक्तपुर में गुरुवार से नेपाली नव वर्ष का स्वागत करने के लिए संगीत और उत्सवों के साथ शुरुआती समारोह शुरू हो गए हैं। भक्तपुर के प्राचीन शहर के नौ-दिवसीय उत्सव बिस्का जात्रा की औपचारिक शुरुआत की पूर्व संध्या पर, दर्जनों किशोरों और युवाओं ने एक साथ मिलकर एक तालबद्ध संगीत प्रस्तुति दी।
नई दिल्ली। नेपाल के प्राचीन शहर भक्तपुर में गुरुवार से नेपाली नव वर्ष का स्वागत करने के लिए संगीत और उत्सवों के साथ शुरुआती समारोह शुरू हो गए हैं। भक्तपुर के प्राचीन शहर के नौ-दिवसीय उत्सव बिस्का जात्रा की औपचारिक शुरुआत की पूर्व संध्या पर, दर्जनों किशोरों और युवाओं ने एक साथ मिलकर एक तालबद्ध संगीत प्रस्तुति दी। पारंपरिक दो-मुंहे बेलनाकार ढोल, धिमे की हर थाप एक अलग कहानी कहती है और नृत्य भी एक ऐसी कहानी बयां करता है जिसका अपना एक विशेष महत्व है। नेपाल के सबसे ऊंचे मंदिर न्यातापोल के सीढ़ियों पर इस सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था।
मनीष घिमिरे ने बताया कि यह प्रस्तुति नेवा समुदाय द्वारा दी गई थी। इसे नेपाली नव वर्ष यानी विक्रम संवत का स्वागत करने के लिए किया जाता है। इसे नेवार लोग अपने पारंपरिक परिधान में प्रस्तुत करते हैं, जिसे आम तौर पर नेवा पोशाक (हकु पतासी) के नाम से जाना जाता है। भक्तपुर के प्राचीन तौमढ़ी चौक में स्थित यह मंदिर बिस्का जात्रा के दौरान उत्सव मनाने वालों और श्रद्धालुओं से खचाखच भर जाता है। लोककथाओं के अनुसार यह उत्सव नेपाली नव वर्ष के आगमन का संकेत देता है। घिमिरे ने कहा कि यह सचमुच बहुत शानदार था। हर एक व्यक्ति पूरी तरह तालमेल बिठाकर नृत्य कर रहा था और कलाकारों से एक भी गलती नहीं हुई, जिससे यह देखने में बेहद सुखद और सुंदर लग रहा था। काठमांडू घाटी के लोकप्रिय धार्मिक उत्सवों में से एक बिस्का जात्रा की शुरुआत नेपाल के सबसे ऊँचे मंदिर न्यातापोल मंदिर के सामने निर्मित एक रथ पर भगवान भैरव के विराजमान होने के साथ होती है। स्थानीय लोगों के दो समूह अपनी शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन करते हुए सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार, इस रथ को विपरीत दिशाओं में खींचने के लिए आपस में जोर-आजमाइश करते हैं। इस उत्सव के एक हिस्से के तौर पर पैगोडा शैली में लकड़ी से निर्मित इस तीन-मंजिला रथ को, जिसमें भैरवनाथ और बेताल की प्रतिमाएं स्थापित होती हैं, जिसे शहर की विभिन्न बस्तियों में घुमाया जाता है। सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व का यह उत्सव नौ दिनों और आठ रातों तक मनाया जाता है। माना जाता है कि मल्ल राजवंश के शासनकाल में शुरू हुआ यह बिस्का जात्रा उत्सव नेपाली नव वर्ष के आगमन से ठीक चार दिन पहले औपचारिक रूप से शुरू होता है।