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Birthday Special: जब गरीब किसान के लिबास में थाने पहुंचे थे चौधरी चरण सिंह, सिपाही ने कहा था बाबा…. हस्ताक्षर करोगे या लगाओगे मोहर…

..... हस्ताक्षर करोगे या अंगूठा लगाओगे। इस पर गरीब किसान बनकर आए चौधरी चरण सिंह ने कहा हस्ताक्षर करुंगा। इसके बाद अपने हस्ताक्षर में अपना नाम लिखा चौधरी चरण सिहं और अपने गंदे से कुर्ते की जेब में हाथ डालकर मोहर निकाली और कागज पर ठोंक दी। जिसमें लिखा था प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया।

By प्रिन्सी साहू 
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मख्यमंत्री, वित्त मंत्री, गृहमंत्री, उपप्रधानमंत्री और फिर प्रधानमंत्री और अंत में किसान नेता के रुप में जाने जाते हैं चौधरी चरण सिंह। इतने बड़े-बड़े पदों पर रहने के बावजूद उन्हें किसान नेता के रुप में जाना जाता है। 23 दिसंबर को उनका जन्म हुआ था। इस दिन को किसान दिवस के रुप में मनाया जाता है। चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को हुआ था। वह भारत किसान नेता और पांचवे प्रधानमंत्री थे।

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उनका जन्म जाट परिवार में हुआ था। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से कानून की शिक्षा लेकर 1928 में ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा पूर्वक गाजियाबाद में वकालत शुरु कर दी। कांग्रेस के लौहर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित हुआ था, जिससे प्रभावित होकर युवा चौधरी चरण सिंह राजनीति में सक्रिय हो गए। उन्होंने गाजियाबाद में कांग्रेस कमेटी का गठन किया। 1930 में जब महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया तो उन्होंने हिंडन नदी पर नमक बनाकर उनका साथ दिया। जिसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा था।

वो किसानों के नेता माने जाते रहे हैं। उनके द्वारा तैयार किया गया जमींदारी उन्मूलन विधेयक राज्य के कल्याणकारी सिद्धांत पर आधारित था। एक जुलाई 1952 को यूपी में उनके बदौलत जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ और गरीबों को अधिकार मिला। उन्होंने लेखपाल के पद का सृजन भी किया। इतना ही नहीं किसानों के हित में उन्होंने 1954 में उत्तर प्रदेश भूमि संरक्षण कानून को पारित कराया। वो 3 अप्रैल 1967 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

17 अप्रैल 1968 को उन्होंने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। मध्यावधि चुनाव में उन्होंने अच्छी सफलता मिली और दोबारा 17 फ़रवरी 1970 के वे मुख्यमंत्री बने। उसके बाद वो केन्द्र सरकार में गृहमंत्री बने तो उन्होंने मंडल और अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की। 1979 में वित्त मंत्री और उपप्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय कृषि व ग्रामीण विकास बैंक की स्थापना की। 28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh) समाजवादी पार्टियों तथा कांग्रेस (यू) के सहयोग से प्रधानमंत्री बने। आज उनके जन्मदिन के मौके पर उनसे जुड़े कुछ किस्सों के बारे में बताने जा रहे है।

जब बेहद मैली धोती कुर्ते में गरीब किसान बन थाने पहुंच गए थे चौधरी चरण सिंह

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मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh) से जुड़ा एक किस्सा और है जब वे प्रधानमंत्री थे और एक थाने में औचक निरीक्षण करने जा पहुंचे थे। एक बार चौधरी चरण सिंह कानून व्यवस्था का हाल जानने के लिए काफिले को दूर खड़ा करके इटावा जिले ऊसराहार थाने में गंदा सा धोती कुर्ता पहन कर रिपोर्ट लिखाने के लिए जा पहुंचे थे।

ये किस्सा है सन 1979 का जब वे दारोगा से बैल चोरी की रिपोर्ट लिखने को कहा, लेकिन सिपाही ने उन्हें इंतजार करने को कहा। कुछ देर तक चौधरी चरण सिंह वहीं बैठे अपनी बारी का इंतजार करते रहे फिर उन्होंने अपनी रिपोर्ट लिखने को कहा। फिर भी सिपाही ने उनकी एक न सुनी। फिर काफी देर के बाद एक सिपाही ने उनसे कहा चलो छोटे दरोगा जी बुला रहे हैं। दारोगा ने चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh) को गरीब किसान समझ उल्टे सीधे सवाल पूछे और रिपोर्ट भी नहीं लिखी। इतने मे एक सिपाही ने उनसे 35 रुपए की रिश्वत लेकर रिपोर्ट लिखने की बात तय की।

रिपोर्ट लिखकर उसने पूछा बाबा….. हस्ताक्षर करोगे या अंगूठा लगाओगे। इस पर गरीब किसान बनकर आए चौधरी चरण सिंह ने कहा हस्ताक्षर करुंगा। इसके बाद अपने हस्ताक्षर में अपना नाम लिखा चौधरी चरण सिहं और अपने गंदे से कुर्ते की जेब में हाथ डालकर मोहर निकाली और कागज पर ठोंक दी। जिसमें लिखा था प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया। मोहर देखते ही वहां मौजूद पुलिस कर्मियों के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई और थाने में हड़कंप मच गया। इसके बाद पूरे के पूरे ऊसराहार थाने को सस्पेंड कर दिया गया था।

इसके अलावा उनसे जुड़ा एक और किस्सा है मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार जब राजनारायण से चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh) ने मुकाबला किया। चौधरी चरण सिंह को प्रधानमंत्री बनाने में सोशलिस्ट नेता राजनारायण बड़ी भूमिका थी। राजनारायण बनारस के रहने वाले थे। उन्हें चौधरी चरण सिंह का हनुमान कहा जाता था। लेकिन आगे चल कर चौधरी चरण सिंह और राजनारायण के बीच गहरे मतभेद हो गए। राजनारायण 1984 का लोकसभा चुनाव लड़ने चौधरी चरण सिंह की सीट बागपत जा पहुंचे।

इतना ही नहीं दोनो का नामांकन भी एक ही दिन था और इत्तेफाक से दोनो एक ही समय पर नामांकन करने जा पहुंचे। राजनारायण को देख चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh) को लगा कि कहीं ऐसा न हो कि उनके समर्थक राजनारायण के साथ किसी तरह की बदसलुकी न कर बैठे। इसलिए चौधरी चरण सिंह ने अपने समर्थकों से कहा कि हम स्थानीय है और राजनारायण जी हमारे मेहमान है। इसलिए हमारी जिम्मेदारी है कि हम लोग उन्हे पूरा सम्मान दें। इसलिए उन्हे पहले नामांकन करने देंगे। उनके नामांकन के बाद ही हम अपना पर्चा भरेंगे। इसके बाद दोनो ने शांतिपूर्ण तरीके से अपना नामांकन किया था। लेकिन जब चुनाव के नतीजे आए तो राजनारायण की बुरी तरह हार हुई।

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जब देवीलाल से जा भिड़े थे चौधरी चरण सिंह

चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh) से जुड़ा एक और किस्सा जुड़ा है मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार एक बार चौधरी चरण सिंह देवी लाल से जा भिड़े थे। दोनो ही बड़े किसान नेता थे। चौधरी चरण सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आते थे जबकि देवीलाल हरियाणा से आते थे। यहां भी पहले दोनो के बीच अच्छे रिश्ते थे लेकिन बाद में दोनो में मनमुटाव हो गया था।

1980 की लोकसभा चुनाव में देवीलाल सोनीपत सांसद चुने गए, लेकिन 1982 की विधानसभा चुनाव में सक्रिय होने के लिए उन्होंने सांसदी छोड़ दी। कांग्रेस के भंवर लाल मुख्यमंत्री बन गए। इसके बाद देवीलाल और चौधरी चरण सिंह के बीच मनमुटाव और बढ़ गया। देवी लाल ने लोकदल छोड़ दिया। 1983 में खाली पड़ी सोनीपत सीट पर उपचुनाव हुआ वहां से चौधरी चरण सिंह ने किताब सिंह मलिक को टिकट दिया। देवीलाल ने जनता पार्टी की टिकट पर किताब सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ गए। जहां से किताब सिंह मलिक और देवीलाल दोनो ही हार गए।

 

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