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अंतरिक्ष में खुलेगा ‘पेट्रोल पंप’, रोबोट हटाएगा कचरा; दवाइयों से खेती तक भारत के स्पेस स्टार्टअप्स फाउंडर्स ने पीएम से साझा किया प्लान

भारत के स्पेस सेक्टर में निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका अब नई तकनीकों का रास्ता खोल रही है। अंतरिक्ष में सैटेलाइट की मरम्मत और रीफ्यूलिंग से लेकर कचरा हटाने और दवाओं पर प्रयोग तक कई महत्वाकांक्षी परियोजनाओं पर काम चल रहा है। खास बात यह है कि भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से भी लगातार नए प्रोजेक्ट मिल रहे हैं...

By Harsh 
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डिजिटल डेस्क, पर्दाफाश।  भारत के स्पेस सेक्टर में निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका अब नई तकनीकों का रास्ता खोल रही है। अंतरिक्ष में सैटेलाइट की मरम्मत और रीफ्यूलिंग से लेकर कचरा हटाने और दवाओं पर प्रयोग तक कई महत्वाकांक्षी परियोजनाओं पर काम चल रहा है। खास बात यह है कि भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से भी लगातार नए प्रोजेक्ट मिल रहे हैं।

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पिछले एक महीने में भारतीय स्पेस स्टार्टअप्स को 8 नए लॉन्च कॉन्ट्रैक्ट मिले हैं। इनमें ज्यादातर विदेशी ग्राहकों से जुड़े हैं। कंपनियां सैटेलाइट इंजन को दूसरे देशों में बेचने और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में ग्राउंड स्टेशन नेटवर्क तैयार करने की दिशा में भी आगे बढ़ रही हैं। सैटेलाइट के ये इंजन उन्हें कई साल तक अंतरिक्ष में अपनी स्थिति बदलने में मदद करते हैं। स्पेस टेक्नोलॉजी का फायदा अब खेती तक पहुंचाने की तैयारी है। भारतीय स्टार्टअप्स करीब 10 लाख किसानों को सैटेलाइट डेटा से जोड़ने की योजना बना रहे हैं। इसके जरिए मौसम, मिट्टी में मौजूद नमी और फसल की स्थिति से जुड़ी जानकारी जुटाई जा सकेगी। इससे किसानों को खेती से जुड़े फैसले लेने में ज्यादा सटीक मदद मिलने की उम्मीद है।

इन बदलावों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 21 अगस्त को देश के 20 स्पेस स्टार्टअप्स के फाउंडर्स के साथ बातचीत की। इस दौरान कंपनियों ने अपने प्रोजेक्ट्स, तकनीकी उपलब्धियों और आगे की योजनाओं की जानकारी दी। इस बातचीत का वीडियो 23 अगस्त को जारी किया गया। पीएम ने स्टार्टअप्स को भरोसा दिलाया कि नए प्रयोग करने और जोखिम उठाने वाले उद्यमियों को सरकार का सहयोग मिलता रहेगा।

विदेश में काम कर रहे इंजीनियरों की भारत वापसी

निजी स्पेस कंपनियों के बढ़ते दायरे का असर देश के टैलेंट पूल पर भी दिखाई दे रहा है। अमेरिका और यूरोप में काम कर रहे कुछ भारतीय इंजीनियर अब भारत लौटकर स्पेस स्टार्टअप्स के साथ काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि देश को ऐसा माहौल तैयार करने की जरूरत है जिससे दुनिया के वैज्ञानिक और इंजीनियर भारत में स्पेस सेक्टर को करियर के बेहतर विकल्प के तौर पर देखें।

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सैटेलाइट के लिए अंतरिक्ष में ही ‘फ्यूल स्टेशन’

भविष्य में किसी सैटेलाइट का ईंधन खत्म होने पर उसे मिशन के बीच में ही बचाने की तकनीक विकसित की जा रही है। एक भारतीय कंपनी डॉकिंग और रीफ्यूलिंग सिस्टम पर काम कर रही है। इसके जरिए एक स्पेसक्राफ्ट दूसरे सैटेलाइट से जुड़कर उसे ऑर्बिट में ही ईंधन दे सकेगा। आसान भाषा में कहें तो अंतरिक्ष में ही ऐसा सिस्टम बनाने की कोशिश है, जो सैटेलाइट्स के लिए पेट्रोल पंप जैसा काम कर सके।

बेकार सैटेलाइट्स की सफाई करेगा रोबोट

ऑर्बिट में बढ़ती सैटेलाइट्स की संख्या के साथ पुराना स्पेस कचरा भी चुनौती बन रहा है। भारतीय स्टार्टअप इस समस्या से निपटने के लिए रोबोटिक स्पेसक्राफ्ट तैयार कर रहा है। यह तकनीक निष्क्रिय हो चुके सैटेलाइट्स को पकड़ने और उन्हें मौजूदा ऑर्बिट से हटाने में इस्तेमाल की जा सकती है। इससे भविष्य के स्पेस मिशनों के लिए रास्ता सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।

जीरो ग्रेविटी में दवाओं पर प्रयोग

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एक और भारतीय कंपनी अंतरिक्ष के माइक्रोग्रैविटी वातावरण का इस्तेमाल फार्मास्युटिकल रिसर्च के लिए करने की तैयारी में है। पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण के कारण प्रोटीन और दूसरे पदार्थों के व्यवहार पर असर पड़ता है। अंतरिक्ष में बेहद कम गुरुत्वाकर्षण वाले माहौल में इन पदार्थों पर प्रयोग कर दवाओं और प्रोटीन से जुड़ी नई संभावनाओं को तलाशा जा रहा है। तैयार उत्पादों को बाद में धरती पर लाने की योजना भी इसी क्षेत्र का हिस्सा है।

हर महीने रॉकेट बनाने से आगे का लक्ष्य

बैठक में स्काईरूट ने अपनी उत्पादन क्षमता और भविष्य की योजनाओं की जानकारी भी प्रधानमंत्री को दी। कंपनी ने बताया कि उसके पास तीन फैक्ट्रियां तैयार हैं और फिलहाल हर महीने एक रॉकेट बनाने की क्षमता विकसित की जा चुकी है। कंपनी की महत्वाकांक्षा लॉन्च की रफ्तार को लगातार बढ़ाने की है। 18 जुलाई को कंपनी ने भारत के पहले निजी रॉकेट से सैटेलाइट्स को सफलतापूर्वक ऑर्बिट में पहुंचाने की जानकारी भी साझा की।

भारत का स्पेस सेक्टर अब सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रह गया है। निजी कंपनियां लॉन्च व्हीकल, सैटेलाइट, स्पेस डेब्रिस, रीफ्यूलिंग, फार्मा रिसर्च और एग्रीकल्चर डेटा जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में उतर रही हैं। सरकार का लक्ष्य भी इन कंपनियों को देश में ऐसा इकोसिस्टम देना है जिससे भारत कम लागत वाली स्पेस टेक्नोलॉजी के साथ वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत जगह बना सके।

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