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9 साल से मैरिज ब्यूरो वाले शादी नहीं ​करवा पाये…, निवारण आयोग का आदेश- मुआवजे के साथ पैसे लौटाने होंगे

कन्नूर के एक नर्सिंग कॉलेज में प्रोफेसर हैं। उन्होंने 25 नवंबर 2016 को एक मैरिज ब्यूरो में शादी के लिए अपना रजिस्ट्रेशन कराया था और इसके बदले 3 हजार रुपये फीस जमा की थी। ब्यूरो ने भरोसा दिया था कि जल्द ही उनके लिए उपयुक्त रिश्ता तलाश लिया जाएगा..

By Harsh 
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कन्नूर। शादी का अच्छा रिश्ता दिलाने का वादा कर फीस लेने वाले एक मैरिज ब्यूरो को आखिरकार अपनी लापरवाही की कीमत चुकानी पड़ेगी। केरल के कन्नूर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक मामले में मैरिज ब्यूरो को सेवा में कमी का दोषी मानते हुए शिकायतकर्ता की फीस लौटाने के साथ मुआवजा और मुकदमे का खर्च भी देने का आदेश दिया है।

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2016 में कराया था रजिस्ट्रेशन

शिकायतकर्ता कन्नूर के एक नर्सिंग कॉलेज में प्रोफेसर हैं। उन्होंने 25 नवंबर 2016 को एक मैरिज ब्यूरो में शादी के लिए अपना रजिस्ट्रेशन कराया था और इसके बदले 3 हजार रुपये फीस जमा की थी। ब्यूरो ने भरोसा दिया था कि जल्द ही उनके लिए उपयुक्त रिश्ता तलाश लिया जाएगा। प्रोफेसर का आरोप है कि इसके बाद कई साल तक ब्यूरो उन्हें हर बार यही कहकर टालता रहा कि अगली बार बेहतर रिश्ता मिलेगा। उनका प्रोफाइल सक्रिय रखा गया, लेकिन नौ साल में उन्हें एक भी ऐसा प्रस्ताव नहीं मिला, जिससे बात आगे बढ़ सके।

पिता की आखिरी इच्छा भी अधूरी रह गई

आयोग के सामने पेश शिकायत में प्रोफेसर ने बताया कि उनके माता-पिता उनकी शादी का इंतजार कर रहे थे। इसी दौरान अक्टूबर 2025 में उनके पिता का कैंसर से निधन हो गया, जबकि उनकी मां भी बीमार हैं। उनका कहना था कि यदि मैरिज ब्यूरो समय पर अपनी जिम्मेदारी निभाता, तो शायद परिस्थितियां अलग होतीं।

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मामला उपभोक्ता आयोग पहुंचने के बाद भी मैरिज ब्यूरो ने कोई जवाब दाखिल नहीं किया और न ही सुनवाई में उपस्थित हुआ। दूसरी ओर शिकायतकर्ता ने रजिस्ट्रेशन फॉर्म और फीस की रसीद समेत सभी जरूरी दस्तावेज आयोग के सामने पेश किए। 30 जून को जारी आदेश में आयोग ने माना कि मैरिज ब्यूरो तय सेवाएं देने में विफल रहा, इसलिए यह सेवा में कमी का स्पष्ट मामला है। आयोग ने ब्यूरो को 30 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता को 3 हजार रुपये रजिस्ट्रेशन फीस, 3 हजार रुपये मानसिक पीड़ा के मुआवजे के रूप में और 2 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के तौर पर चुकाने का आदेश दिया। साथ ही आयोग ने स्पष्ट किया कि यदि तय समय के भीतर भुगतान नहीं किया गया, तो रिफंड की राशि पर आदेश की तारीख से 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

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