करीब 86 साल से लंबित किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना को अंतत: आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है। नई दिल्ली में 15 सितंबर 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के बीच परियोजना को लेकर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।
नई दिल्ली। करीब 86 साल से लंबित किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना को अंतत: आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है। नई दिल्ली में 15 सितंबर 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के बीच परियोजना को लेकर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।
वास्तव में किशाऊ परियोजना की परिकल्पना वर्ष 1940 में की गई थी। बता दें कि यह परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा के पास टौंस नदी पर प्रस्तावित है। यमुना की प्रमुख सहायक नदियों में से एक टौंस है। परियोजना का उदेश्य केवल बांध बनाना नहीं, बल्कि पानी का भंडारण, सिंचाई, पेयजल और जलविद्युत उत्पादन जैसी जरूरतों को पूरा करना है। इस परियोजना के तहत करीब 232.6 मीटर ऊंचे कंक्रीट ग्रेविटी डैम का निर्माण प्रस्तावित है। केंद्र सरकार के मुताबिक, इसकी जल भंडारण क्षमता करीब 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर होगी। इससे लगभग 97 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई और करीब 1,476 मिलियन यूनिट जलविद्युत उत्पादन का लक्ष्य है।
छह राज्यों के लिए यह परियोजना इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
अलग-अलग राज्यों की जरूरत के हिसाब से किशाऊ बांध से जमा होने वाले पानी का इस्तेमाल किया जाएगा। समझौते के अनुसार हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और उत्तराखंड को इसके पानी का लाभ मिलेगा, जबकि परियोजना से पैदा होने वाली बिजली का लाभ भी संबंधित राज्यों को मिलेगा। राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र के लिए भी इस परियोजना से पानी मिलने की बात का खुलासा हुआ है। इस परियोजना का एक सबसे बड़ा पहलू यमुना का पुनर्जीवन भी है। केंद्र के मुताबिक, किशाऊ परियोजना से यमुना में पानी का प्रवाह बेहतर करने में मदद मिल सकती है, जिससे नदी के प्रवाह और जल गुणवत्ता से जुड़े प्रयासों को भी समर्थन मिलेगा।
आपको बता दें कि यह परियोजना लंबे समय तक जल बंटवारे, लागत और राज्यों के बीच हिस्सेदारी जैसे मुद्दों के कारण अटकी रही। जून 2026 में केंद्र की मध्यस्थता में इन मुद्दों पर सहमति बनने के बाद समझौता ज्ञापन का रास्ता खुला। इस परियोजना के जल घटक की लागत का करीब 90 प्रतिशत केंद्र सरकार वहन करेगी, जबकि बाकी 10 प्रतिशत हिस्सा छह सहभागी राज्य साझा करेंगे। राज्य सरकार ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के जन्मदिन के मौके के आसपास हुए इस समझौते को लंबे समय से प्रतीक्षित परियोजना को गति मिलने के रूप में पेश किया है। हालांकि, इसे सीधे “जन्मदिन की सौगात” कहने के बजाय यह कहना अधिक सटीक है कि 15 सितंबर को हुआ समझौता ज्ञापन परियोजना के क्रियान्वयन की दिशा में अहम कदम है।
गौरतलब है कि 1940 में जिस परियोजना की कल्पना हुई थी, उसे 2026 में छह राज्यों की सहमति के साथ आगे बढ़ाने का रास्ता मिला है। अब नजर इस बात पर होगी कि समझौता ज्ञापन के बाद परियोजना की औपचारिक मंजूरियां और निर्माण कार्य कितनी तेजी से आगे बढ़ते हैं।