दिल्ली में अक्टूबर से दिसंबर के बीच हवा में घुलने वाली मीठी और तेज खुशबू का राज है सप्तपर्णी का पेड़, जिसे अंग्रेजी में ‘डेविल ट्री’ यानी शैतान का पेड़ भी कहा जाता है। इस पेड़ की पहचान सिर्फ रहस्यमयी कथाओं तक सीमित नहीं है। इसकी हल्की लकड़ी का इस्तेमाल कभी बच्चों की स्लेटों के फ्रेम बनाने में होता था, इसलिए इसे ‘ब्लैकबोर्ड ट्री’ भी कहते हैं।
Saptaparni Flowers: अक्टूबर आते ही दिल्ली की हवा में एक अलग तरह की मीठी और तेज खुशबू घुलने लगती है। कई लोगों को यह महक किसी इत्र जैसी लगती है, तो कुछ के लिए इसकी तीव्रता परेशानी का कारण बन जाती है। लेकिन इस खुशबू के पीछे किसी परफ्यूम का नहीं, बल्कि एक खास पेड़ का हाथ है। इसका नाम है सप्तपर्णी, जिसे अंग्रेजी में ‘डेविल ट्री’ यानी शैतान का पेड़ भी कहा जाता है।
सप्तपर्णी का वैज्ञानिक नाम Alstonia scholaris है। इस पर आमतौर पर सितंबर के आखिरी दिनों से फूल खिलने शुरू होते हैं और अक्टूबर से दिसंबर के बीच इनकी खुशबू ज्यादा महसूस होती है। इसके छोटे-छोटे क्रीम या हल्के रंग के फूल गुच्छों में खिलते हैं। शाम के समय इनकी तेज महक आसपास के इलाकों में फैल जाती है। दिल्ली में सड़क किनारे, पार्कों और रिहायशी इलाकों में लगे सप्तपर्णी के पेड़ अब शहर के बदलते मौसम की पहचान बन चुके हैं।
सप्तपर्णी को ‘शैतान का पेड़’ कहे जाने के पीछे कई पुरानी लोककथाएं प्रचलित हैं। दक्षिण भारत में प्रचलित एक कहानी के मुताबिक, यक्षिणियां सप्तपर्णी के पेड़ों पर रहती थीं। मान्यता थी कि वे कभी बेहद खूबसूरत महिलाओं का रूप लेकर लोगों को अपने आकर्षण में बांध लेती थीं।
एक कहानी के मुताबिक, जंगल से गुजर रहे एक ब्राह्मण को सफेद कपड़ों में एक सुंदर महिला मिली। वह उसे अपने घर ले गई, लेकिन लोककथा में बाद में उसे यक्षिणी बताया गया। ब्राह्मण उसके मोह में ऐसा डूबा कि धीरे-धीरे अपनी सेहत खोने लगा और आखिरकार उसकी मृत्यु हो गई। ऐसी कहानियों ने लंबे समय तक सप्तपर्णी को रहस्य और डर से जोड़कर रखा। हालांकि, इन कथाओं का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
सप्तपर्णी की पहचान सिर्फ लोककथाओं तक सीमित नहीं है। इसकी हल्की लकड़ी का इस्तेमाल पहले बच्चों की स्लेटों के फ्रेम बनाने में भी किया जाता था। इसी वजह से इसे ‘ब्लैकबोर्ड ट्री’ भी कहा जाता है। इस पेड़ का सम्मान साहित्यकार रवींद्रनाथ टैगोर से जुड़ी एक परंपरा में भी दिखाई देता है, विश्व भारती विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह के दौरान विद्यार्थियों को सप्तपर्णी की पत्तियां देने की परंपरा शुरू की गई। इस तरह कभी रहस्यमयी कहानियों में पहचाना जाने वाला पेड़ शिक्षा और सम्मान का प्रतीक भी बन गया। आज यह पेड़ दिल्ली की अक्टूबर वाली खुशबू और मौसम का अहम हिस्सा बन चुका है।