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जयपुर से वैश्विक मंच तक : सावन में लहरिया का क्रेज और महारानी गायत्री देवी की अमर फैशन विरासत

सावन का महीना आते ही राजस्थान की धरा एक अलग ही रंग में रंग जाती है। आसमान में उमड़ते-घुमड़ते बादलों की फुहारों के बीच जब हवा में तरंगें उठती हैं, तो प्रदेश भर में 'लहरिया' पहनने का दौर शुरू हो जाता है। हरियाली तीज और सावन के पावन अवसरों पर सुहाग, सौभाग्य और खुशहाली का प्रतीक माना जाने वाला लहरिया केवल एक पारंपरिक परिधान नहीं, बल्कि राजस्थानी संस्कृति की आत्मा है।

By santosh singh 
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राजस्थान। सावन का महीना आते ही राजस्थान की धरा एक अलग ही रंग में रंग जाती है। आसमान में उमड़ते-घुमड़ते बादलों की फुहारों के बीच जब हवा में तरंगें उठती हैं, तो प्रदेश भर में ‘लहरिया’ पहनने का दौर शुरू हो जाता है। हरियाली तीज और सावन के पावन अवसरों पर सुहाग, सौभाग्य और खुशहाली का प्रतीक माना जाने वाला लहरिया केवल एक पारंपरिक परिधान नहीं, बल्कि राजस्थानी संस्कृति की आत्मा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पारंपरिक लहरिया, शिफॉन और जॉर्जेट को वैश्विक पटल पर एक ‘इंटरनेशनल फैशन आइकॉन’ का दर्जा दिलाने में जयपुर की पूर्व महारानी गायत्री देवी का कितना ऐतिहासिक योगदान रहा है?

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प्रकृति की प्रेरणा से उपजा लहरिया

राजस्थान में सावन के महीने का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। नीले आसमान पर जब काले-सफेद बादलों की घटाएं छाती हैं, तो उस प्राकृतिक सौंदर्य और हवा में बहती लहरों से प्रेरित होकर ‘लहरिया’ डिजाइन अस्तित्व में आया। रंग-बिरंगी आड़ी-तिरछी धारियों वाला यह परिधान सावन की फुहारों, चारों ओर बिखरी हरियाली और जीवन में नई उमंग का संदेश देता है। सदियों से महिलाएं सावन और तीज के त्योहारों पर इसे बड़े चाव से पहनती आ रही हैं।

महारानी गायत्री देवी का रॉयल तड़का

लहरिया और साड़ियों के ट्रेंड को नया जीवन और आधुनिक पहचान देने का काम जयपुर की राजमाता महारानी गायत्री देवी ने किया। वह केवल एक महारानी नहीं थीं, बल्कि एक दूरदर्शी व्यक्तित्व की धनी थीं। जब उन्होंने राजमहल के वैभव से निकलकर जनसेवा और राजनीति के मैदान में कदम रखा, तो विशाल बहुमत और रिकॉर्ड वोटों से जीतकर संसद पहुंचीं। उनकी सादगी, निर्भीकता और गरिमा ने हर देशवासी का दिल जीत लिया।

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जब भारी पोशाकों की जगह ली हल्की साड़ियों ने ​ली एक जमाना था जब राजघरानों में महिलाएं केवल भारी-भरकम ‘राजपूती पोशाक’ ही पहना करती थीं। महारानी गायत्री देवी ने यूरोप से मंगवाई गई हल्की शिफॉन और जॉर्जेट की साड़ियों को अपना स्टाइल स्टेटमेंट बनाया। विशेष रूप से सावन और गर्मी के दिनों में, उन्होंने भारी वस्त्रों के बजाय हल्के शिफॉन व जॉर्जेट के लहरिया और पेस्टल (पेस्टल शेड्स) रंगों को प्राथमिकता दी। गले में मोती की खूबसूरत माला (पर्ल नेकलेस), न्यूनतम मेकअप, छोटे कटे बाल और सिर पर सलीके से रखा पल्लू—उनका यह सहज और रॉयल अंदाज इतना सम्मोहक था कि अंतरराष्ट्रीय फैशन मैगजीन ‘वोग’ (Vogue) ने भी उन्हें दुनिया की सबसे खूबसूरत महिलाओं में शामिल किया।

परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम

आज जब जयपुर ही नहीं, बल्कि देश-विदेश की महिलाएं सावन और तीज के मौके पर हल्के जॉर्जेट व शिफॉन का लहरिया पहनती हैं, तो वे महारानी गायत्री देवी की उसी क्लासिक फैशन विरासत को जीवंत कर रही होती हैं। महारानी गायत्री देवी ने दुनिया को यह सिखाया कि परंपराओ के साथ माडॅनिटी भी समय के साथ जरूरी है।

रिपोर्ट : दीपांजली मिश्रा

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