भारत और डेनमार्क ने समुद्री इतिहास से जुड़े एक महत्वपूर्ण मिशन की शुरुआत की है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और डेनमार्क के नेशनल म्यूजियम के बीच हुए समझौते के तहत 17वीं सदी…
नई दिल्ली। भारत और डेनमार्क ने समुद्री इतिहास से जुड़े एक महत्वपूर्ण मिशन की शुरुआत की है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और डेनमार्क के नेशनल म्यूजियम के बीच हुए समझौते के तहत 17वीं सदी में भारतीय तट के पास डूबे डेनिश जहाज ‘ओरेसुंड’ की खोज की जाएगी। इस पहल को दोनों देशों के साझा समुद्री इतिहास को समझने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
1619 में भारत पहुंचा था जहाज
ऐतिहासिक रिकॉर्ड के मुताबिक, ओरेसुंड भारत पहुंचने वाला पहला ज्ञात डेनिश जहाज माना जाता है। वर्ष 1619 में यह भारतीय जलक्षेत्र में पहुंचा था, लेकिन कराईकल तट के पास समुद्री दुर्घटना का शिकार होकर डूब गया। इतिहासकारों का मानना है कि जहाज के अवशेष मिलने से उस दौर के व्यापारिक संबंधों, समुद्री मार्गों और यूरोपीय देशों की भारत में मौजूदगी से जुड़ी कई अहम जानकारियां सामने आ सकती हैं।
आधुनिक तकनीक से होगी खोज
इस परियोजना में दोनों देशों के विशेषज्ञ मिलकर समुद्र के भीतर सर्वेक्षण करेंगे। इसके लिए अत्याधुनिक उपकरणों और वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। खोज अभियान के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा जाएगा कि समुद्री पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक धरोहरों को किसी तरह का नुकसान न पहुंचे।
भारत के लिए भी अहम परियोजना
यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अंडरवॉटर आर्कियोलॉजी विंग की किसी विदेशी संस्था के साथ पहली संयुक्त परियोजना है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भारत को समुद्री पुरातत्व के क्षेत्र में नई तकनीकों और अंतरराष्ट्रीय अनुभव का लाभ मिलेगा, जिससे भविष्य में ऐसे और शोध कार्यों को बढ़ावा मिलेगा।
खुल सकते हैं इतिहास के नए राज
विशेषज्ञों के अनुसार समुद्र की गहराइयों में छिपे अवशेष इतिहास की कई अनकही कहानियों को अपने भीतर समेटे हुए हैं। यदि ओरेसुंड के अवशेष खोज लिए जाते हैं, तो 17वीं सदी के समुद्री व्यापार और भारत-डेनमार्क के शुरुआती संबंधों पर नई रोशनी पड़ सकती है। यह खोज इतिहास, पुरातत्व और सांस्कृतिक विरासत के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि साबित हो सकती है।