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‘अच्छे दिन’ जैसी जुमलेबाज़ी चुनावी छलावा से ज़्यादा कुछ नहीं…सीएम नीतीश कुमार के एक करोड़ से ज्यादा रोजगार देने के वादे पर बोलीं मायावती

मायावती ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, बिहार में क़ानून-व्यवस्था की बदहाल स्थिति की राष्ट्रीय चर्चाओं के बीच, संभवतः लोगों का ध्यान बांटने के लिए, राज्य में एनडीए गठबंधन की सरकार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार द्वारा चुनाव बाद सरकार बनने पर अगले पांच साल में एक करोड़ लोगोें को नौकरी और रोज़गार उपलब्ध कराने की घोषणा वास्तव में लोगों को हकीकत से दूर, उनके अनुभवों के आधार पर, 'अच्छे दिन' जैसी जुमलेबाज़ी व चुनावी छलावा ज़्यादा लगता है।

By शिव मौर्या 
Updated Date

लखनऊ। बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी बढ़ने लगी है। कानून व्यवस्था के मुद्दे को लेकर नीतीश सरकार चौतरफा घिर गई है। इन सबके बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अगले पांच साल में एक करोड़ लोगों को रोजगार देने की बात कही है। अब बसपा सुप्रीमो ने इसको लेकर नीतीश कुमार पर पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि, घोषणा वास्तव में लोगों को हकीकत से दूर, उनके अनुभवों के आधार पर, ‘अच्छे दिन’ जैसी जुमलेबाज़ी व चुनावी छलावा ज़्यादा लगता है।

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मायावती ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, बिहार में क़ानून-व्यवस्था की बदहाल स्थिति की राष्ट्रीय चर्चाओं के बीच, संभवतः लोगों का ध्यान बांटने के लिए, राज्य में एनडीए गठबंधन की सरकार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार द्वारा चुनाव बाद सरकार बनने पर अगले पांच साल में एक करोड़ लोगोें को नौकरी और रोज़गार उपलब्ध कराने की घोषणा वास्तव में लोगों को हकीकत से दूर, उनके अनुभवों के आधार पर, ‘अच्छे दिन’ जैसी जुमलेबाज़ी व चुनावी छलावा ज़्यादा लगता है।

वैसे तो विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के चुनावी वादे, दावे, घोषणाओं व छलावों के साथ-साथ कानून-व्यवस्था व कार्यकलापों आदि को लेकर इनके चाल, चरित्र व चेहरे आदि को जनता भलीभांति जानती है, फिर भी अपनी छल व छलावा की राजनीति की आदत से मजबूर ये विरोधी पार्टियां चुनाव से पूर्व इस प्रकार के अनेकों लोक लुभावने वादे करने में ज़रा भी नहीं डरती व घबराती हैं।

इसी क्रम में बिहार की वर्तमान गठबंधन सरकार का नौकरी व रोज़गार का वादा इनके अन्य वादों से ज़्यादा मेल खाता है, जो जनता वास्तव में अब तक के उनके अनुभव के आधार पर जानती भी है। निश्चिय ही बिहार की जनता सोच-समझकर ग़रीब व सर्वजन हितैषी सरकार चुनेगी, बशर्ते कि चुनाव बाहुबल, धनबल तथा सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग से मुक्त पूर्णतः स्वतंत्र व निष्पक्ष हो तथा सभी ग़रीबों, मज़दूरों एवं अन्य मेहनतकश लोगों को वोट करने का सही से मौका मिले। चुनाव आयोग इसका पूरा ध्यान ज़रूर रखेगा, ऐसी उम्मीद।

 

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