करवा चौथ की सुंदर सजी हुई थाली, हाथ में छलनी लिए महिला और सामने रखा मिट्टी का करवा और नए धान का सफेद, सुंदर पवित्र प्रसाद मिटटी की कहानी का वह सच बताता है जिसे सबको जानना चाहिए। ऋषियों के देश भारत में कृषि संस्कृति का समग्र रूप व्रत त्योहारों में दिखता है।
karva chauth nai dhan: करवा चौथ की सुंदर सजी हुई थाली, हाथ में छलनी लिए महिला और सामने रखा मिट्टी का करवा और नए धान का सफेद, सुंदर पवित्र प्रसाद मिटटी की कहानी का वह सच बताता है जिसे सबको जानना चाहिए। ऋषियों के देश भारत में कृषि संस्कृति का समग्र रूप व्रत त्योहारों में दिखता है। मिट्टी का करवा और मिट्टी से उपजे धान—यह हमारी संस्कृति, प्रकृति और जीवन के जुड़ाव का प्रतीक है। मिट्टी से बने ‘करवे’ (मिट्टी का कलश या बर्तन, जो विशेषकर करवा चौथ पर या पारंपरिक आयोजनों में काम आता है) और धरती की कोख से उपजे ‘धान’ (चावल) दोनों ही मिट्टी (माटी) की महक और उसकी उर्वरा शक्ति से जुड़े हैं।
करवा चौथ के व्रत में जितना महत्व कथा और पूजा का है, उतना ही जरूरी है माता का पारंपरिक भोग। यह प्रसाद माता करवा को बेहद प्रिय है और इसके बिना कई जगह पूजा अधूरी मानी जाती है। करवा चौथ की शाम को पूजा के समय, मिट्टी के करवे के ऊपर इस प्रसाद को रखा जाता है। मान्यता है कि नए अनाज का यह पहला भोग लगाने से घर में साल भर सुख, समृद्धि और अन्न-धन के भंडार भरे रहते हैं।
मान्यता है कि करवे के ऊपर रखा जाने वाला यह मीठा प्रसाद चंद्रमा को अर्घ्य देने और उन्हें ‘जिमाने’ (भोग लगाने) के काम आता है। अलग-अलग क्षेत्रों और पारिवारिक परंपराओं (कुलरीति) के अनुसार इस प्रसाद में थोड़ा बदलाव हो सकता है।
फर्रे
उत्तर प्रदेश में करवा चौथ की थाली या भोग में चावल के आटे और दाल से बने फर्रे (स्टीम किए हुए पीठा/डंप्लिड्स) को बहुत शुभ माना जाता है। व्रत पूरा होने के बाद या प्रसाद के रूप में इनका सेवन किया जाता है। चावल के फरे सिर्फ भोग का हिस्सा ही नहीं बल्किी इनके पीछे अखंड सौभाग्य से जुड़ी कोई धार्मिक मान्यता भी छिपी है।करवा चौथ के व्रत में बिना तेल-मसाले या केवल भाप में पके सात्विक भोजन का भोग लगाने का नियम सदियों से चला आ रहा है। फरा पूरी तरह भाप में पकने के कारण अत्यंत शुद्ध और सात्विक भोजन माना जाता है।