सरकारी विभागों और संस्थानों में वर्षों तक दैनिक वेतन पर काम करने वाले कर्मचारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है। उत्तर प्रदेश से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दशकों से अस्थायी आधार पर सेवाएं दे रहे छह कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनके नियमितीकरण और अन्य सेवा लाभों के संबंध में विस्तृत निर्देश जारी किए हैं।
नई दिल्ली। सरकारी विभागों और संस्थानों में वर्षों तक दैनिक वेतन पर काम करने वाले कर्मचारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है। उत्तर प्रदेश से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दशकों से अस्थायी आधार पर सेवाएं दे रहे छह कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनके नियमितीकरण और अन्य सेवा लाभों के संबंध में विस्तृत निर्देश जारी किए हैं।
यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो लंबे समय से सरकारी संस्थानों में नियमित प्रकृति का काम कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें स्थायी कर्मचारी का दर्जा नहीं दिया जा रहा।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग (U.P. Higher Education Services Commission) से जुड़ा है। इस आयोग में छह कर्मचारियों को वर्ष 1989 से 1992 के बीच नियुक्त किया गया था।* *इनमें पांच कर्मचारी चतुर्थ श्रेणी के पदों पर चपरासी और परिचारक से संबंधित कार्य कर रहे थे, जबकि एक कर्मचारी चालक के रूप में सेवाएं दे रहा था।
ये कर्मचारी लंबे समय तक दैनिक वेतन के आधार पर काम करते रहे। हालांकि, इनकी सेवाएं किसी अस्थायी या कभी-कभार होने वाले काम तक सीमित नहीं थीं, बल्कि आयोग के नियमित कार्यालयीन कार्यों में इनकी लगातार आवश्यकता बनी हुई थी।
कर्मचारियों का कहना था कि वे वर्षों से लगातार काम कर रहे हैं, इसके बावजूद उन्हें नियमित कर्मचारी का दर्जा नहीं दिया गया।
सरकार ने नियमित पद बनाने से क्यों किया इनकार?
मामले के रिकॉर्ड के अनुसार, आयोग ने वर्ष 1991 में चतुर्थ और तृतीय श्रेणी के 14 पद सृजित करने का प्रस्ताव भेजा था। बाद में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की सूची में इन अपीलकर्ताओं के नाम भी शामिल किए गए।
हालांकि, राज्य सरकार ने 11 नवंबर 1999 को वित्तीय कठिनाइयों का हवाला देते हुए प्रस्ताव को मंजूरी देने से इनकार कर दिया। इसके बाद 2003 में दोबारा विचार के बावजूद नए पदों के सृजन पर रोक और वित्तीय स्थिति का हवाला देकर प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया गया।
कर्मचारियों ने इस फैसले को चुनौती दी और मामला न्यायालय तक पहुंचा। शुरुआत में इलाहाबाद हाई कोर्ट से उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने 19 अगस्त 2025 को Civil Appeal No. 8558 of 2018 में फैसला सुनाया।* *न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि सरकार एक संवैधानिक नियोक्ता है। वह केवल वित्तीय कठिनाइयों का सामान्य हवाला देकर उन कर्मचारियों के अधिकारों की अनदेखी नहीं कर सकती, जिनसे वर्षों तक नियमित और स्थायी प्रकृति का काम लिया जाता रहा है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब किसी संस्थान में काम लगातार और साल-दर-साल होता है, तो उस वास्तविक जरूरत के अनुसार स्वीकृत पदों और नियुक्ति व्यवस्था को व्यवस्थित करना चाहिए।
कोर्ट ने सरकार के उन आदेशों को निरस्त कर दिया, जिनके माध्यम से आयोग के प्रस्तावित पदों को मंजूरी देने से इनकार किया गया था।
कर्मचारियों को क्या-क्या लाभ देने के निर्देश दिए गए?
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित छह अपीलकर्ताओं के लिए कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए।
1. नियमितीकरण का आदेश
सभी अपीलकर्ताओं को 24 अप्रैल 2002 से नियमित माना जाएगा। इसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार और उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग को संबंधित तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के संवर्गों में अतिरिक्त पद (Supernumerary Posts) सृजित करने के निर्देश दिए गए।
2. नियमित वेतनमान का लाभ
कर्मचारियों को संबंधित पद के नियमित वेतनमान के न्यूनतम स्तर से कम वेतन नहीं दिया जाएगा। यदि उनका पहले से प्राप्त वेतन अधिक है, तो उसका संरक्षण भी किया जाएगा। इसके साथ वेतनमान के अनुसार बाद के वेतनवृद्धि लाभ भी मिलेंगे।
3. बकाया वेतन का भुगतान
24 अप्रैल 2002 से नियमितीकरण, सेवानिवृत्ति या मृत्यु की संबंधित तारीख तक मिलने वाले नियमित वेतन और स्वीकार्य भत्तों तथा वास्तव में पहले दिए गए भुगतान के बीच का अंतर बकाया के रूप में देने का निर्देश दिया गया है। पहले दिए गए भुगतान का समायोजन भी किया जाएगा।
4. वरिष्ठता और प्रमोशन का लाभ
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित कर्मचारियों की वरिष्ठता और प्रमोशन के लिए सेवा की गणना 24 अप्रैल 2002 से नियमितीकरण की तारीख के आधार पर की जाएगी।
5. रिटायर हो चुके कर्मचारियों को भी राहत
जो कर्मचारी पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं, उनके वेतन का पुनर्निर्धारण किया जाएगा। इसके आधार पर पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों की दोबारा गणना करके भुगतान करने के निर्देश दिए गए।
6. मृत कर्मचारियों के परिवार को लाभ
मुकदमे के दौरान जिन अपीलकर्ताओं की मृत्यु हो गई, उनके कानूनी प्रतिनिधियों को संबंधित अवधि का बकाया और पुनर्गणना के अनुसार देय सेवानिवृत्ति लाभ देने का निर्देश दिया गया। *कोर्ट ने बकाया भुगतान और संशोधित पेंशन एवं सेवानिवृत्ति लाभों के लिए तीन महीने की समय-सीमा तथा संबंधित अधिकारियों से चार महीने के भीतर अनुपालन हलफनामा दाखिल करने को कहा।
दूसरे राज्यों के संविदा और दैनिक वेतन कर्मचारियों के लिए क्या है इस फैसले का महत्व?
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय तक अस्थायी आधार पर काम कराने और फिर वित्तीय कठिनाइयों का हवाला देकर नियमित पदों की जरूरत को नजरअंदाज करने की सरकारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
इससे दूसरे राज्यों के ऐसे कर्मचारी भी अपने सेवा संबंधी मामलों को समझने के लिए इस फैसले का अध्ययन कर सकते हैं, जो वर्षों से दैनिक वेतन, अस्थायी या संविदा आधार पर नियमित प्रकृति का काम कर रहे हैं।
हालांकि, इस फैसले के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि देश के सभी संविदा, आउटसोर्स या दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी अपने आप सरकारी कर्मचारी बन जाएंगे।
किसी दूसरे कर्मचारी को इस फैसले का लाभ मिलेगा या नहीं, यह उसकी नियुक्ति की परिस्थितियों, विभाग, सेवा रिकॉर्ड, कार्य की प्रकृति, स्वीकृत पदों, लागू सेवा नियमों और अन्य कानूनी तथ्यों पर निर्भर करेगा।
कर्मचारियों के लिए क्या है इस फैसले से सीख?
सरकारी संस्थानों में लंबे समय तक काम करने वाले कर्मचारियों के लिए यह फैसला एक महत्वपूर्ण कानूनी उदाहरण है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि लगातार नियमित प्रकृति का काम लेने के बावजूद कर्मचारियों को अनिश्चितकाल तक अस्थायी स्थिति में रखना हर परिस्थिति में उचित नहीं माना जा सकता। इसलिए ऐसे कर्मचारियों को अपने नियुक्ति आदेश, उपस्थिति रिकॉर्ड, वेतन भुगतान का विवरण, सेवा की निरंतरता और विभागीय पत्राचार जैसे दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए। नियमितीकरण या अन्य सेवा लाभों के लिए कानूनी सलाह लेते समय ये दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
फैसले का नाम: Dharam Singh & Others v. State of U.P. & Another केस नंबर: Civil Appeal No. 8558 of 2018 निर्णय की तारीख: 19 अगस्त 2025 साइटेशन: 2025 INSC 998 न्यायमूर्ति: Justice Vikram Nath और Justice Sandeep Mehta
शैक्षणिक एवं कर्मचारी जागरूकता सूचना: यह खबर सुप्रीम कोर्ट के वास्तविक निर्णय पर आधारित है। इसका उद्देश्य कर्मचारियों को उनके सेवा संबंधी कानूनी अधिकारों और न्यायालय के फैसलों के प्रति जागरूक करना है। यह सभी राज्यों के कर्मचारियों के स्वतः नियमितीकरण का आदेश नहीं है और न ही व्यक्तिगत कानूनी सलाह है।