सनातन धर्म और हिंदू पूजा पद्धति में अर्घ्य का अत्यधिक पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व है, जिसे देवताओं के प्रति सम्मान प्रकट करने, प्रकृति संतुलन बनाए रखने और मोक्ष प्राप्ति का एक सशक्त माध्यम माना गया है।
Arghya in Karva Chauth Puja : सनातन धर्म और हिंदू पूजा पद्धति में अर्घ्य का अत्यधिक पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व है, जिसे देवताओं के प्रति सम्मान प्रकट करने, प्रकृति संतुलन बनाए रखने और मोक्ष प्राप्ति का एक सशक्त माध्यम माना गया है।
स्कंद पुराण, भविष्य पुराण और गरुड़ पुराण जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में सूर्य को अर्घ्य देने की महिमा का विशेष वर्णन है। ‘अर्घ्य’ शब्द का शाब्दिक अर्थ पूजनीय देवता को सम्मानपूर्वक जल या पवित्र सामग्रियां अर्पित करना होता है, जो मुख्य रूप से सूर्य देव और अन्य देवताओं की उपासना में अनिवार्य माना गया है।
करवा चौथ की पूजा में चंद्रमा को अर्घ्य देने का अत्यधिक पौराणिक और धार्मिक महत्व है, जो सुहाग की लंबी आयु, मानसिक शांति और वैवाहिक जीवन की मधुरता से जुड़ा है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, अर्घ्य दिए बिना यह कठिन निर्जला व्रत पूर्ण नहीं माना जाता है। वैदिक ज्योतिष और पौराणिक कथाओं में चंद्रमा को मन, मानसिक शांति, माता और शीतलता का कारक माना गया है।
चंद्रमा को अर्घ्य देकर सुहागिन महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती से प्रार्थना करती हैं कि उनके पति का जीवन और उनका दांपत्य रिश्ता भी चंद्रमा की तरह ही शांत, शीतल और खुशहाल बना रहे।
करवे में भरा जल जीवन और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। जब महिलाएं करवे से चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करती हैं, तो वे चंद्र देव से अपने पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य का वरदान मांगती हैं।