लखनऊ। पिछले कुछ दिनों में महाराष्ट्र में एफडीए चीफ तुकाराम मुंढे ने एक के बाद एक एक्शन से काफी सुर्खियां बटोरीं हैं। उन्होंने खाद्य पदार्थों और दवाई कंपनियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं। इसके साथ ही आईएएस तुकाराम ने खुलासा किया है कि निजी अस्पतालों में दवाइयां कई गुना ज्यादा कीमत पर बेची जा रही है। मुंढे के अनुसार, एक निजी अस्पताल ने IV इन्फ्यूजन सेट ₹11.05 में खरीदा, जबकि उसकी MRP ₹325 थी। अब एफडीए चीफ की सिफारिश पर एनपीपीए ने जांच शुरू कर दी है। हालांकि, ये बात सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। यूपी के कई निजी अस्पतालों में भी यही खेल चल रहा है।
लखनऊ। पिछले कुछ दिनों में महाराष्ट्र में एफडीए चीफ तुकाराम मुंढे ने एक के बाद एक एक्शन से काफी सुर्खियां बटोरीं हैं। उन्होंने खाद्य पदार्थों और दवाई कंपनियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं। इसके साथ ही आईएएस तुकाराम ने खुलासा किया है कि निजी अस्पतालों में दवाइयां कई गुना ज्यादा कीमत पर बेची जा रही है। मुंढे के अनुसार, एक निजी अस्पताल ने IV इन्फ्यूजन सेट ₹11.05 में खरीदा, जबकि उसकी MRP ₹325 थी। अब एफडीए चीफ की सिफारिश पर एनपीपीए ने जांच शुरू कर दी है। हालांकि, ये बात सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। यूपी के कई निजी अस्पतालों में भी यही खेल चल रहा है।
एक हिन्दी अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, यूपी की राजधानी लखनऊ के एक निजी अस्पताल में कैंसर के मरीजों और तीमारदारों को दवाइयां थोक कीमत की तुलना में कई गुना ज्यादा दाम पर बेची जा रही है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि लोट्रीफंग माउथ पेट (100 ML) नाम की दवा जिसकी कीमत थोक बाजार में महज 48 रुपये है। उसे इस अस्पताल में 628 रुपये में दिया गया। इसी तरह से एलेक्स सिरप (100 ML) को 142 रुपये में बेचा जा रहा है, जिसकी थोक बाजार में कीमत 18 रुपये है। थोक बाजार में कैटिलम बायोटेक की Caxfila-OS सिरप, जो 1,155 रुपये में उपलब्ध है। वो इस अस्पताल में 3,375 रुपये में मिली। यानी एक ही सिरप पर 2,220 रुपये का भारी अंतर। इसके अलावा, लिडोविस टॉपिकल सॉल्यूशन (300 ML) और स्टोमैकेयर म्यूको एडहेसिव जेल (15 GM) जैसी दवाओं पर भी बड़ा मार्जिन वसूला जा रहा है।
सूत्रों की मानें तो यह खेल शहर के सिर्फ एक निजी अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि कई जाने-माने अस्पतालों में भी यही खेल चल रहा है। इस मामले में दवा व्यापारियों से सवाल किया गया तो उन्होंने बताया कि उत्पाद बेचने की अंधी होड़ में दवा कंपनियां अस्पताल के काउंटरों और दवा दुकानों को भारी-भरकम मार्जिन (प्रॉफिट) लालच देती हैं और वास्तविक निर्माण लागत कम (अधिकतम खुदरा मूल्य) जानबूझकर कई गुना ज्यादा अंकित की जाती है, जिससे विक्रेता मोटा मुनाफा कमा सकें। इसके अलावा, लोगों की मनोवैज्ञानिक सोच भी उनके काम को और आसान बना देती है। उन्हें लगता है कि कि महंगी दवा ज्यादा असरदार और कम दाम वाली दवा कम असरदार होती है। कंपनियां इसी सोच का खूब फायदा उठाती हैं।
कौन होगा यूपी का तुकाराम?
महाराष्ट्र में एफडीए चीफ तुकाराम मुंढे ने दवा कंपनियों और निजी अस्पतालों के इसी खेल को उजागर करने की कोशिश की है। उनका कहना है कि समस्या सिर्फ कीमत की नहीं, बल्कि मरीजों को सही जानकारी और पारदर्शिता न मिलने की भी है। निजी अस्पतालों में थमाए गए बिल को मरीजों के बिना सवाल के स्वीकार करना पड़ता है। उन्होंने दावा किया कि कई मेडिकल उत्पादों की MRP अस्पताल की खरीद कीमत से काफी ज्यादा हो सकती है। अब इस मामले में महाराष्ट्र एफडीए के सर्वे के आधार पर डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्युटिकल्स और एनपीपीए से समीक्षा की सिफारिश की गई है। एनपीपीए यह जांच कर रहा है कि मेडिकल उत्पादों के निर्माता और बिचौलिये कितना मार्जिन जोड़ रहे हैं। अब सवाल उठता है कि यूपी में जिम्मेदार लोग कब तुकराम जैसे कड़े कदम उठाएंगे और दवाओं पर मनमाने मुनाफे कमाने का खेल बंद होगा।