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‘महिला LPG सिलेंडर नहीं उठा सकती’: 38 साल पहले इंडियन ऑयल ने यह कहकर नौकरी नहीं दी, SC बोला- 12 लाख रुपये मुआवजा दो

करीब चार दशक पहले नौकरी के लिए दर-दर भटकने वाली हरियाणा की सुमित्रा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अब फैसला सुनाया है। अदालत ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) को उन्हें 12 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। सुमित्रा को 1988 में LPG बॉटलिंग प्लांट में काम के लिए योग्य पाए जाने के बावजूद नियुक्ति नहीं दी गई थी...

By Harsh 
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नई दिल्ली। करीब चार दशक पहले नौकरी के लिए दर-दर भटकने वाली हरियाणा की सुमित्रा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अब फैसला सुनाया है। अदालत ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) को उन्हें 12 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। सुमित्रा को 1988 में LPG बॉटलिंग प्लांट में काम के लिए योग्य पाए जाने के बावजूद नियुक्ति नहीं दी गई थी। बाद में सामने आया कि उनके महिला होने को ही नौकरी से दूर रखने की वजह बनाया गया था।

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सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस दलील पर भी सवाल उठाया कि LPG सिलेंडर उठाने और रात की ड्यूटी जैसे काम महिलाओं के लिए उपयुक्त नहीं माने जा सकते। सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि क्या महिलाएं घरों में गैस सिलेंडर नहीं उठातीं। पीठ ने कहा कि केवल महिला होने के आधार पर किसी योग्य उम्मीदवार को नौकरी से बाहर करना महिला गरिमा का अपमान है।

1988 में इंटरव्यू दिया, 49 नामों में शामिल थीं सुमित्रा

मामला तब शुरू हुआ, जब हरियाणा में LPG बॉटलिंग प्लांट के लिए कर्मचारियों की भर्ती की प्रक्रिया चल रही थी। सुमित्रा उन 49 उम्मीदवारों में शामिल थीं, जिनके नाम नौकरी के लिए अनुशंसित किए गए थे। उन्होंने खलासी, चपरासी और रीफिलिंग हेल्पर जैसे पदों के लिए इंटरव्यू दिया था। रिपोर्टों के मुताबिक 43 उम्मीदवारों को नियुक्त किया गया, लेकिन सुमित्रा को नौकरी नहीं मिली।

सुमित्रा ने इसके बाद अदालत का दरवाजा खटखटाया। ट्रायल कोर्ट ने 1990 में उनके पक्ष में फैसला देते हुए IOCL को उन्हें मजदूर के पद से अलग किसी अन्य पद पर समायोजित करने का निर्देश दिया था। कंपनी ने इस आदेश को चुनौती दी और मामला आगे बढ़ता गया।

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एक फैसले से दूसरे कोर्ट तक पहुंचा मामला

IOCL की अपील पर प्रथम अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को पलट दिया। इसके बाद मामला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा। अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के आदेश को बरकरार नहीं रखा। इसके बाद सुमित्रा ने सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट के सामने कंपनी की ओर से यह तर्क रखा गया कि काम में LPG सिलेंडर उठाने के साथ-साथ पुरुष कर्मचारियों के बीच विषम समय की शिफ्ट में काम करना पड़ता था। इसी आधार पर सुमित्रा को उस पद के लिए उपयुक्त नहीं माना गया था। अदालत ने इस तर्क को महिला को केवल उसके लिंग के आधार पर अलग करने से जुड़ा माना।

सुमित्रा ने जिस नौकरी के लिए 1988 में कानूनी लड़ाई शुरू की थी, तब से अब तक 38 साल से ज्यादा समय गुजर चुका है। इस दौरान वह सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर चुकी हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने अब उन्हें नौकरी देने के बजाय 12 लाख रुपये की एकमुश्त राशि देने का आदेश दिया। अदालत ने लंबे समय तक चले मुकदमे और नौकरी के अवसर से वंचित किए जाने के पहलू को भी ध्यान में रखा।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल थे। मामले में अदालत ने यह भी कहा कि जब किसी महिला की योग्यता पूरी हो और सिर्फ उसके महिला होने को नियुक्ति से इनकार का आधार बनाया जाए, तो ऐसा रवैया स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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