उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर UCC यानी Uniform Civil Code यानी समान नागरिक संहिता का मुद्दा चर्चा में है। दरअसल, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 15 सितंबर 2026 को कहा कि 2029 से पहले BJP-NDA शासित 21 राज्यों में UCC लागू किया जाएगा। इसके बाद उत्तर प्रदेश BJP ने भी UCC को पार्टी की प्रमुख प्रतिबद्धताओं में शामिल बताते हुए इस दिशा में आगे बढ़ने की बात कही है।
उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर UCC यानी Uniform Civil Code यानी समान नागरिक संहिता का मुद्दा चर्चा में है। दरअसल, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 15 सितंबर 2026 को कहा कि 2029 से पहले BJP-NDA शासित 21 राज्यों में UCC लागू किया जाएगा। इसके बाद उत्तर प्रदेश BJP ने भी UCC को पार्टी की प्रमुख प्रतिबद्धताओं में शामिल बताते हुए इस दिशा में आगे बढ़ने की बात कही है।
लेकिन सबसे पहले समझिए— UCC आखिर है क्या?
समान नागरिक संहिता का मतलब है कि धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय नागरिक मामलों में एक समान कानूनी व्यवस्था हो। इसका संबंध मुख्य रूप से विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति और गोद लेने जैसे मामलों से है। उत्तराखंड के मौजूदा UCC नियम भी इन्हीं व्यक्तिगत नागरिक मामलों को एक समान कानूनी ढांचे में लाते हैं।
संविधान UCC के बारे में क्या कहता है?
संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को पूरे देश में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने की बात कही गई है। UCC कोई नया संवैधानिक विचार नहीं है। संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में इसका उल्लेख पहले से मौजूद है।
अब बात उत्तर प्रदेश की
यूपी में अभी UCC लागू नहीं है। लेकिन सितंबर 2026 में केंद्र की नई समयसीमा वाली घोषणा के बाद राज्य में इसे लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हुई है। BJP इसे समान नागरिक अधिकार और महिलाओं के अधिकारों से जोड़कर पेश कर रही है। दूसरी तरफ विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक-धार्मिक संगठनों ने इसके प्रावधानों, व्यक्तिगत कानूनों और अल्पसंख्यक अधिकारों पर संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठाए हैं। ये अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक पक्षों के दावे हैं, जिनका मूल्यांकन प्रस्तावित कानून के वास्तविक प्रावधानों के आधार पर ही किया जा सकता है।
इसका एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि UCC का मॉडल पूरे देश में अभी एक जैसा लागू नहीं है। उत्तराखंड में UCC लागू हो चुका है और वहां इसके तहत विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और दूसरे नागरिक मामलों के लिए नियम बनाए गए हैं। तो अब यूपी में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उत्तर प्रदेश भी UCC की दिशा में आगे बढ़ेगा? इसके लिए राज्य सरकार क्या कानूनी कदम उठाएगी और प्रस्तावित कानून में किन प्रावधानों को शामिल किया जाएगा? यानी UCC अब सिर्फ एक कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि नीति, व्यक्तिगत कानून और राजनीतिक बहस—तीनों के केंद्र में आ गया है।