वट सावित्री व्रत भारतीय सुहागिन महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र त्योहारों में से एक है। जिसे वे अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए करती हैं।
Vat Savitri Vrat 2026 : वट सावित्री व्रत भारतीय सुहागिन महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र त्योहारों में से एक है। जिसे वे अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए करती हैं। यह दिन सती सावित्री की अटूट भक्ति का प्रतीक है, जिन्होंने अपनी दृढ़ता और बुद्धिमत्ता से यमराज (मृत्यु के देवता) से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे।
यह व्रत हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को रखा जाता है। साल 2026 में यह व्रत 16 मई, शनिवार को मनाया जाएगा।
प्राचीन समय में सावित्री नाम की एक पतिव्रता स्त्री थी। उसके पति सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी। जिस दिन सत्यवान की मृत्यु हुई,तब यमराज स्वयं उनकी आत्मा लेने आए। लेकिन सावित्री ने हार नहीं मानी…
वह यमराज के पीछे-पीछे चलती रही। उसकी बुद्धि, तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर यमराज ने उसे वरदान देना शुरू किया। सावित्री ने चालाकी से ऐसे वर मांगे कि अंत में उसे अपने पति का जीवन ही वापस मिल गया। इसी शक्ति और तपस्या की याद में
मनाया जाता है वट सावित्री व्रत
वट वृक्ष का महत्व
इस दिन बरगद (वट) के पेड़ की पूजा की जाती है, जिसे दीर्घायु और स्थायित्व का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इसी वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस प्राप्त किए थे।
सावित्री और सत्यवान की कथा
पूजा विधि:महिलाएं वट वृक्ष को जल अर्पित करती हैं और चंदन, रोली, अक्षत व फूलों से उसकी पूजा करती हैं।वृक्ष के चारों ओर कच्चे सूत या कलावा बांधते हुए 3, 5, 7 या 108 बार परिक्रमा की जाती है।पूजा में भीगे हुए काले चने, ऋतु फल (जैसे आम, खरबूजा) और मिठाई का भोग लगाया जाता है। सावित्री और सत्यवान की कथा सुनी जाती है।
नियम और खान-पान
कई महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं, जबकि कुछ फलाहार का पालन करती हैं।व्रत का पारण अक्सर वट वृक्ष की कोपल (नई पत्ती) खाकर या चने और गुड़ का प्रसाद ग्रहण करके किया जाता है। इस दिन वृक्ष की टहनियां या पत्तियां तोड़ना वर्जित माना जाता है।