कोलकाता के बिधान सरणी इलाके में स्थित ठनठनिया काली मंदिर अपनी अनोखी परंपराओं के लिए जाना जाता है।
Thanthania Kali Temple : कोलकाता के बिधान सरणी इलाके में स्थित ठनठनिया काली मंदिर अपनी अनोखी परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहां माता काली की पूजा सिद्धेश्वरी रूप में की जाती है। यह मंदिर बाकी मंदिरों से इसलिए अलग है क्योंकि यहां पूजा-पाठ का तरीका पारंपरिक नहीं, बल्कि तांत्रिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है।
मंदिर का इतिहास और नाम कैसे पड़ा
कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण लगभग 1703 के आसपास तांत्रिक उदय नारायण ब्रह्मचारी ने करवाया था। उस समय यह इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ था। मान्यता है कि जंगल से गुजरते लोगों को मंदिर की घंटियों की “ठन-ठन” आवाज सुनाई देती थी, और इसी आवाज के कारण इस जगह का नाम “ठनठनिया” पड़ गया।
माता को झींगा मछली का भोग क्यों चढ़ाया जाता है
इस मंदिर की सबसे खास और चौंकाने वाली परंपरा है माता को झींगा मछली का भोग अर्पित करना। तांत्रिक परंपराओं में देवी-देवताओं को कई बार सामान्य से अलग, यहां तक कि मांसाहारी भोग भी चढ़ाया जाता है।
लोककथाओं के अनुसार, एक समय रामकृष्ण परमहंस के एक शिष्य की तबीयत काफी खराब थी। उस दौरान रामकृष्ण परमहंस ने माता काली से प्रार्थना की और नारियल के साथ झींगा मछली का भोग अर्पित किया। कहा जाता है कि इसके बाद शिष्य को स्वास्थ्य लाभ मिला। इसी घटना को इस परंपरा की शुरुआत माना जाता है।
आज भी कायम है यह परंपरा
समय बदल गया, लेकिन यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। भक्तों के लिए यह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि गहरी आस्था और विश्वास का प्रतीक है। यही कारण है कि ठनठनिया काली मंदिर अपनी अलग पहचान और रहस्यमयी परंपराओं के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।
रिपोर्ट: कौशिकी गुप्ता