बद्रीनाथ धाम की महिमा और उनकी कथाओं का गुणगान युगों युगों से होता आ रहा है। तीर्थ बद्रीधाम की एक पैरौणिक कथा के अनुसार सहस्रकवच राक्षस के वध की कथा का वर्णन मिलता है।
Badrinath Dham Ki Mahima : बद्रीनाथ धाम की महिमा और उनकी कथाओं का गुणगान युगों युगों से होता आ रहा है। तीर्थ बद्रीधाम की एक पैरौणिक कथा के अनुसार सहस्रकवच राक्षस के वध की कथा का वर्णन मिलता है। ‘सहस्रकवच’ का अर्थ है “हजार कवचों वाला”। पौराणिक काल में एक अत्यंत शक्तिशाली राक्षस था जिसका नाम ‘सहस्रकवच'(जिसे दंबोधव भी कहा जाता है) था और उसके पास एक हज़ार अभेद्य कवच थे। उसके हर एक कवच को तोड़ने के लिए एक हज़ार साल की तपस्या और फिर युद्ध की आवश्यकता थी।
कवच टूटते ही तत्काल मृत्यु
‘सहस्रकवच’ को सूर्य की तपस्या के बाद अभेद्य 1000 दिव्य कवच का वरदान प्राप्त हुआ। वरदान में एक शर्त थी कि उसके एक कवच को वही तोड़ सके, जिसने 1000 वर्षों तक कठिन तपस्या की हो कवच तोड़ने के लिए उसे सहस्रकवच से 1000 वर्षों तक निरंतर युद्ध करना होगा। इसी के साथ जो भी उसका कवच तोड़ेगा, कवच टूटते ही उसकी तत्काल मृत्यु हो जाएगी
नर और नारायण अवतार
भगवान विष्णु के नर और नारायण अवतार ने मिलकर चतुराई से काम लिया। जब नारायण एक हज़ार साल तपस्या करते, तब नर उस राक्षस से युद्ध करके उसका एक कवच तोड़ देते। इस तरह बारी-बारी से तप और युद्ध करते हुए उन्होंने सहस्रकवच के 999 कवच नष्ट कर दिए। अंतिम कवच के साथ वही राक्षस द्वापर युग में ‘कर्ण’ के रूप में जन्मा था।