देशभर के बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख बाबा महाकालेश्वर के दरबार में ब्रह्ममुहूर्त में होने वाली 'भस्म आरती' पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इस अलौकिक आरती को देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव को भस्म यानी राख क्यों चढ़ाई जाती है? आइए जानते है इसके पीछे के छिपे गहरे रहस्य?
उज्जैन। देशभर के बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख बाबा महाकालेश्वर के दरबार में ब्रह्ममुहूर्त में होने वाली ‘भस्म आरती’ पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इस अलौकिक आरती को देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव को भस्म यानी राख क्यों चढ़ाई जाती है? आइए जानते है इसके पीछे के छिपे गहरे रहस्य?
जीवन का अंतिम सत्य है भस्म
शिव महापुराण के मुताबिक, भस्म को भगवान शिव का मुख्य स्वरूप और आभूषण माना गया है। सनातन धर्म में कहा गया है कि भस्म सृष्टि की नश्वरता का प्रतीक है। महाकाल को मृत्यु का स्वामी यानी ‘कालों का काल’ कहा जाता है। भगवान शिव अपने शरीर पर भस्म लगाकर भक्तों को यह संदेश देते हैं कि यह भौतिक संसार, धन, वैभव और मानव शरीर सब क्षण भर के लिए है। क्योंकि अंत में सब कुछ राख में ही विलीन होना है।
चिता की राख से गोबर के कंडों तक का सफर
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शिव जी को श्मशान का निवासी और वैरागी माना गया है। प्राचीन काल में महाकाल का श्रृंगार श्मशान की तुरंत जली हुई चिता की भस्म से किया जाता था। हालांकि, समय के साथ अब इस परंपरा का स्वरूप बदल चुका है। आजकल भस्म आरती के लिए चिता की राख का उपयोग नहीं होता। वर्तमान में यह विशेष पवित्र भस्म कपिला गाय के गोबर से बने कंडों यानी उपलें और पीपल, शमी, पलाश, बड़ व अमलतास जैसी पवित्र लकड़ियों को जलाकर तैयार की जाती है। साथ ही इसमें बहुत सी औषधीय जड़ी-बूटियां भी मिलाई जाती हैं।
दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग का विशेष महत्व
उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एकमात्र ज्योतिर्लिंग है जो दक्षिण दिशा की ओर मुख किए हुए है। हिंदू शास्त्रों में इसे दक्षिण दिशा के स्वामी यमराज यानी मृत्यु के देवता के रूप में माने गए हैं। दक्षिण दिशा की तरफ मुख होना, महाकाल के काल-अधिपति और तंत्र साधना के सबसे उपरी केंद्र होने को दर्शाता है। इसी वजह से यहां काल को नियंत्रित करने वाली भस्म आरती का विशेष प्रथा सदियों से चली आ रही है।
कड़े नियमों के बीच होती है आरती
आपको बता दें कि महाकाल मंदिर में भस्म आरती प्रतिदिन सुबह ब्रह्ममुहूर्त में तड़के 4:00 बजे शुरू हो जाती है। इस आरती से जुड़े नियम बहुत सख्त हैं। आरती के दौरान जब गर्भगृह में भगवान को भस्म चढ़ाई जाती है, तब महिलाओं को कुछ समय के लिए घूंघट करने या अपनी आंखें बंद करने का आदेश दिया जाता है। ऐसी मान्यता हैं कि उस क्षण भगवान शिव निराकार और अत्यंत रौद्र रूप में होते हैं। इसके अलावा पूजा संपन्न करने वाले पुजारियों को भी केवल एक सूती धोती पहनकर ही गर्भगृह में प्रवेश की आज्ञा होती है।