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Devi Bhagwat Puran : “देवी भागवत का सबसे रहस्यमयी प्रसंग”,”जब माँ ने लिया यक्ष रूप”

क्या आप जानते हैं कि एक बार स्वर्ग के राजा इंद्र को भी देवी माँ की शक्ति के सामने अपना सिर झुकाना पड़ा था? देवी भागवत पुराण का यह प्रसंग हर भक्त के लिए जानना बहुत ज़रूरी है। एक बार महिषासुर का वध करने के बाद, देवराज इंद्र और सभी देवताओं में यह अहंकार आ गया कि उन्होंने अपनी शक्ति से असुरों को हराया है। माँ भगवती ने उनका यह अहंकार तोड़ने के लिए एक अद्भुत लीला रची।

By अनूप कुमार 
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DeviBhagwatPuran : क्या आप जानते हैं कि एक बार स्वर्ग के राजा इंद्र को भी देवी माँ की शक्ति के सामने अपना सिर झुकाना पड़ा था? देवी भागवत पुराण का यह प्रसंग हर भक्त के लिए जानना बहुत ज़रूरी है। एक बार महिषासुर का वध करने के बाद, देवराज इंद्र और सभी देवताओं में यह अहंकार आ गया कि उन्होंने अपनी शक्ति से असुरों को हराया है। माँ भगवती ने उनका यह अहंकार तोड़ने के लिए एक अद्भुत लीला रची।

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देवताओं के घमंड को देखकर माँ दुर्गा उनके सामने एक अत्यंत दिव्य और विशाल ‘यक्ष’ (तेजपुंज) के रूप में प्रकट हुईं। उस तेज को देखकर सभी देवता सहम गए। इंद्र ने सबसे पहले अग्निदेव को भेजा और कहा, “जाओ पता करो यह कौन है।”
अग्निदेव उस तेज के पास पहुँचे और गर्व से बोले, “मैं अग्नि हूँ, मैं ब्रह्मांड की किसी भी चीज़ को पल भर में भस्म कर सकता हूँ।”
तब उस दिव्य यक्ष ने अग्निदेव के सामने एक छोटा सा तिनका (घास का टुकड़ा) रखा और कहा, “ज़रा इसे जलाकर दिखाओ।”

अग्निदेव ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी, भयंकर लपटें छोड़ीं, लेकिन वो उस छोटे से तिनके को छू तक नहीं पाए! वे लज्जित होकर लौट आए। इसके बाद वायुदेव गए, जिन्होंने गर्व से कहा कि वे पूरी सृष्टि को उड़ा सकते हैं। यक्ष ने फिर वही तिनका रखा और उड़ाने को कहा। वायुदेव ने अपनी पूरी ताकत से आंधी चला दी, लेकिन तिनका टस से मस नहीं हुआ।

ज्ञान की प्राप्ति
जब अग्नि और वायु दोनों असफल हो गए, तब देवराज इंद्र का अहंकार चूर-चूर हो गया। वे स्वयं उस तेज के सामने गए और पूरी विनम्रता से सिर झुकाकर पूछा, “हे दिव्य पुरुष, आप कौन हैं? कृपया हमें मार्गदर्शित करें।”
जैसे ही इंद्र का अहंकार समाप्त हुआ, वह यक्ष अंतर्ध्यान हो गया और उसकी जगह साक्षात जगदम्बा, माँ भगवती प्रकट हुईं। माँ ने मुस्कुराते हुए इंद्र से कहा, “हे इंद्र! यह जो विजय तुम्हें मिली है, वह तुम्हारी या देवताओं की शक्ति नहीं है। यह मेरी ही आदि-शक्ति है, जिसके बल पर तुम असुरों को हरा पाए हो। तुम्हारे भीतर की शक्ति भी मेरी ही दी हुई है।”

इंद्र को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने माँ से क्षमा मांगी। तो दोस्तों, देवी भागवत का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि हमारे पास जो भी शक्ति, बुद्धि या धन है, वह सब माँ भगवती की कृपा है। कभी भी अपनी उपलब्धियों पर अहंकार न करें, बल्कि हमेशा माँ के चरणों में समर्पित रहें। क्योंकि जहाँ अहंकार होता है, वहाँ ईश्वर नहीं होते। अगर आपको यह प्रसंग अच्छा लगा हो, तो वीडियो को लाइक, शेयर करें और कमेंट में ‘जय माता दी’ ज़रूर लिखें। चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें!

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