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Lifestyle : रील्स की अंतहीन स्क्रॉलिंग और अकेलापन, युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को कर रहा है खोखला

वर्तमान जीवनशैली और तकनीक के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल ने युवाओं को एक ऐसे मायाजाल में धकेल दिया है, जो बहुत ही तेजी से उनके मानसिक स्वास्थ्य को खोखला करता जा रहा है। आज के वक्त में सोशल ​मीडिया पर रील्स और शॉर्ट्स देखने की ​असीमित आदत और समाज से परे बढ़ता अकेलापन और गहराता डिप्रेशन युवाओं के बीच एक साइलेंट महामारी बन कर उभर रहा हैं।

By संतोष सिंह 
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लखनऊ। वर्तमान जीवनशैली और तकनीक के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल ने युवाओं को एक ऐसे मायाजाल में धकेल दिया है, जो बहुत ही तेजी से उनके मानसिक स्वास्थ्य को खोखला करता जा रहा है। आज के वक्त में सोशल ​मीडिया पर रील्स और शॉर्ट्स देखने की ​असीमित आदत और समाज से परे बढ़ता अकेलापन और गहराता डिप्रेशन युवाओं के बीच एक साइलेंट महामारी बन कर उभर रहा हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, ‘डोपामाइन लूप’ इस समस्या की मुख्य जड़ है। जब भी कोई युवा लगातार रील्स स्क्रॉल करता है तो प्रत्येक 15 सेकंड में मिलने वाला नया कंटेंट दिमाग में डोपामाइन जो कि खुशी का हार्मोन होता है, का कृत्रिम ओवरडोज़ रिलीज करता है।

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इस तुरंत मिलने वाली संतुष्टि के कारण युवाओं के एकाग्रता की अवधि घटकर बहुत कम हो गई है और आज के युवा किसी गंभीर काम या पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने में खुद को असमर्थ अनुभव कर रहे हैं, जिसकी वजह से उनमें चिड़चिड़ापन और धैर्य की भारी कमी देखने को मिल रही है। इसके अलावा, सोशल मीडिया की फिल्टर और परफेक्शन वाली काल्पनिक दुनिया युवाओं में तुलना और हीनता की भावना पैदा कर रही है। इसकी वजह से युवा, रील्स पर दूसरों की जीवनशैली और बेहतरीन लुक्स देखकर अनजाने में ही अपनी वास्तविक जिंदगी से निराश हो रहे हैं। भले ही वर्चुअल दुनिया में युवाओं के हजारों फॉलोअर्स होते है लेकिन इसके बावजूद भी उनके पास असल जिंदगी में अपनी भावनाएं साझा करने के लिए कोई सच्चा दोस्त नहीं होता, जिससे अकेलापन और बढ़ जाता है।

रातभर सोशल मीडिया पर स्क्रीन स्क्रॉलिंग करने की वजह से ‘मेलाटोनिन’ हार्मोन का बनना बंद हो जाता है जो नींद के लिए जरूरी होता है। अंतत: नींद की कमी और शारीरिक गतिहीनता गंभीर क्लिनिकल डिप्रेशन का रूप धारण कर लेती है। काल्पनिक दुनिया के इस दलदल से निकलने के लिए आज के युवाओं को अपनी दिनचर्या में तुरंत सुधार करने होंगे। रोजाना कम से कम 2 घंटे का ‘डिजिटल डिटॉक्स’ अपनाएं और साथ ही स्मार्टफोन में ऐप्स पर टाइम लिमिट सेट करें। रात को सोने से एक घंटे पहले फोन को पूरी तरह अपने से दूर कर दें। इसके अलावा आभासी दुनिया से बाहर निकलकर असल दोस्तों से मिलें, खेलकूद या नई हॉबी अपनाएं ताकि दिमाग प्राकृतिक रूप से स्वस्थ रह सके।

रिपोर्ट: सुशील कुमार साह

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