भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का पावन पर्व 'रक्षाबंधन' इस बार एक विशेष खगोलीय और ज्योतिषीय संयोग के बीच मनाया जा रहा है। त्योहार के दिन चंद्र ग्रहण और सूतक काल का साया रहने के कारण श्रद्धालुओं और बहनों के बीच पूजा-पाठ तथा राखी बाँधने के सही समय को लेकर उलझन बनी हुई है।
लखनऊ। भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का पावन पर्व ‘रक्षाबंधन’ इस बार एक विशेष खगोलीय और ज्योतिषीय संयोग के बीच मनाया जा रहा है। त्योहार के दिन चंद्र ग्रहण और सूतक काल का साया रहने के कारण श्रद्धालुओं और बहनों के बीच पूजा-पाठ तथा राखी बाँधने के सही समय को लेकर उलझन बनी हुई है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, ग्रहण और भद्रा काल के दौरान कोई भी शुभ कार्य या रक्षासूत्र बाँधना पूरी तरह से वर्जित माना जाता है। भद्रा और सूतक काल में क्यों वर्जित है राखी?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भद्रा काल में बांधी गई राखी अशुभ फल देती है। वहीं, ग्रहण शुरू होने से ठीक 9 घंटे पहले सूतक काल लागू हो जाता है। सूतक काल लगते ही प्रकृति में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है, जिसके कारण मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और सभी प्रकार के धार्मिक व मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं। यही वजह है कि सूतक काल शुरू होने के बाद भाई की कलाई पर रक्षासूत्र नहीं बाँधा जाता।
राखी बांधने का सबसे शुभ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, बहनों को घबराने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। इस दिन राखी बांधने के लिए दो स्पष्ट विकल्प मिलेंगे
सुबह का शुभ समय : सूतक काल शुरू होने से पहले, यानी सुबह-सुबह का समय राखी बाँधने के लिए सबसे श्रेष्ठ है। सुबह जल्दी स्नान करके पूजा की थाली तैयार करें, प्रथम पूज्य भगवान को पहली राखी अर्पित करें और दोपहर से पहले भाई को तिलक लगाकर राखी बाँध दें।
ग्रहण मोक्ष के बाद का समय : यदि किसी कारणवश सुबह का समय छूट जाता है, तो ग्रहण समाप्त होने और मोक्ष काल के बाद ही राखी बाँधी जा सकती है। इसके लिए शाम या रात में पुनः स्नान करके शुद्ध हों, घर में पूजा करें और फिर रक्षाबंधन का पर्व मनाएँ। ग्रहण और सूतक काल के दौरान बरतें ये सावधानियाँ
ग्रहण के दुष्प्रभाव से बचने और त्योहार की पवित्रता बनाए रखने के लिए कुछ खास नियमों का पालन करना ज़रूरी है।
खान-पान की सुरक्षा: सूतक काल शुरू होने से पहले ही पीने के पानी, पके हुए भोजन और दूध में तुलसी के पत्ते डाल दें, ताकि ग्रहण की किरणों का असर उन पर न पड़े।
पूजा-पाठ के नियम: सूतक लगते ही घर के मंदिर को पर्दे से ढंक दें और मूर्तियों को न छुएं। इस दौरान मन ही मन ‘गायत्री मंत्र’ या ‘महामृत्युंजय मंत्र’ का मानसिक जाप करना शुभ माना जाता है।
गर्भवती महिलाओं के लिए सावधानी: गर्भवती महिलाएं ग्रहण के समय घर से बाहर न निकलें और कैंची, चाकू जैसी नुकीली चीज़ों का प्रयोग करने से बचें।
ग्रहण समाप्त होते ही पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करें, स्वयं स्नान करें और अपनी सामर्थ्य के अनुसार अनाज या वस्त्रों का दान करें। शास्त्रों के नियमों का सही पालन करते हुए और शुभ मुहूर्त का ध्यान रखकर आप इस पावन पर्व को पूरे आनंद और उत्साह के साथ मना सकते हैं।
रिपोर्ट: दीपांजली मिश्रा