नवरात्रि के नौ दिनों के पावन व्रत के बाद, महाअष्टमी या महानवमी को कन्या पूजन करना सबसे पवित्र काम माना जाता है। हम सभी 9 छोटी कन्याओं को माता रानी का स्वरूप मानकर पूजते हैं।
Navaratri ‘Batuk Bhairav’ : नवरात्रि के नौ दिनों के पावन व्रत के बाद, महाअष्टमी या महानवमी को कन्या पूजन करना सबसे पवित्र काम माना जाता है। हम सभी 9 छोटी कन्याओं को माता रानी का स्वरूप मानकर पूजते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कन्या पूजन तब तक पूरा नहीं माना जाता, जब तक उसमें कम से कम एक छोटा बालक शामिल न हो? इस बालक को बटुक भैरव या ‘लांगुरिया’ कहा जाता है। आखिर इनके बिना कन्या पूजन अधूरा क्यों है? आइए जानते है इसके पीछे का गहरा रहस्य जानते हैं।
भैरव रूप
शास्त्रों के अनुसार, जब माता दुर्गा ने महिषासुर का वध करने के लिए अवतार लिया, तो भगवान शिव ने माता की रक्षा और उनकी सहायता के लिए भैरव रूप धारण किया था।
छोटा बालक बटुक भैरव
माता दुर्गा ने स्वयं भैरव बाबा को यह वरदान दिया था कि— “शक्तिपीठों की पूजा तब तक पूरी नहीं होगी, जब तक भक्त तुम्हारे दर्शन नहीं करेंगे।”
ठीक इसी तरह, कन्या पूजन में 9 कन्याएं नौ देवियों (नवदुर्गा) का रूप होती हैं, और उनके साथ बैठा वह एक छोटा बालक बटुक भैरव (भगवान शिव का बाल रूप) का प्रतीक होता है। उनके बिना यह पूजा अधूरी रह जाती है।
रक्षा और सम्मान
इसके पीछे एक और बहुत ही सुंदर संदेश है। सनातन धर्म में देवियों के साथ हमेशा उनके रक्षक या पहरेदार के रूप में भैरव देव मौजूद रहते हैं। कन्या पूजन में बालक को बैठाना इस बात का प्रतीक है कि समाज में जहां नारी शक्ति (देवियां) पूजनीय हैं, वहीं पुरुषों का कर्तव्य उनकी रक्षा और सम्मान करना है।
‘लांगुरिया’
संत तुलसीदास जी ने भी हनुमान जी को लांगुरिया के रूप में माता सीता का परम भक्त बताया है। इसलिए कई जगहों पर इस बालक को हनुमान जी का रूप मानकर ‘लांगुरिया’ भी कहा जाता है।
उपहार और दक्षिणा
तो नियम क्या कहता है? कन्या पूजन में हमेशा 2 वर्ष से 10 वर्ष तक की 9 कन्याओं को बुलाएं। और उनके साथ एक या दो बालकों को बटुक भैरव के रूप में जरूर बिठाएं। सबसे पहले कन्याओं और बालक के पैर धोएं, उन्हें कुमकुम का तिलक लगाएं, कलावा बांधें और प्रेम से हलवा, पूरी व काले चने का भोग खिलाएं। अंत में उन्हें उपहार और दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लें।
नकारात्मक ऊर्जाओं
वहीं भैरव बाबा की उपस्थिति से घर के सारे कष्ट दूर होते हैं और माता रानी अत्यंत प्रसन्न होती हैं। इनकी साधना से बुरी नजर, तंत्र-बाधा, भूत-प्रेत और सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश होता है।