आज बात उस मुद्दे की जो दशकों से देश की राजनीति और समाज के बीच सबसे संवेदनशील बहस का हिस्सा रहा है- आरक्षण। लेकिन इस बार सवाल सिर्फ आरक्षण जारी रखने या खत्म करने का नहीं है सवाल ये है कि आरक्षण का फायदा किसे मिल रहा है किसे मिलना चाहिए और क्या...
नई दिल्ली। आज बात उस मुद्दे की जो दशकों से देश की राजनीति और समाज के बीच सबसे संवेदनशील बहस का हिस्सा रहा है- आरक्षण। लेकिन इस बार सवाल सिर्फ आरक्षण जारी रखने या खत्म करने का नहीं है सवाल ये है कि आरक्षण का फायदा किसे मिल रहा है किसे मिलना चाहिए और क्या इसका लाभ उन लोगों तक भी पहुंच रहा है जो अब तक इससे वंचित हैं
दरअसल आरक्षण को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। एक तरफ RSS प्रमुख मोहन भागवत का बयान चर्चा में है तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने आरक्षण के भीतर आय के आधार पर सब-कोटा बनाने की मांग का विरोध किया है। मोहन भागवत ने कहा कि जिन लोगों को आरक्षण का लाभ मिल चुका है और जो सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ चुके हैं उन्हें उदारता दिखाते हुए खुद पीछे हटने पर विचार करना चाहिए ताकि उनके समुदाय के दूसरे जरूरतमंद लोगों को भी आरक्षण का लाभ मिल सके। भागवत ने आरक्षण खत्म करने की समय-सीमा पर सीधा जवाब देने से इनकार किया और कहा कि इसके लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर की सोच को समझना चाहिए।
अब इसी बीच नजर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर डालिए। केंद्र सरकार ने अदालत में साफ कहा है कि SC और ST आरक्षण का आधार आर्थिक कमजोरी नहीं बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक भेदभाव है। यानी सरकार का तर्क है कि जिस तरह OBC में क्रीमी लेयर की व्यवस्था है उसी आधार पर SC और ST में आर्थिक रूप से मजबूत लोगों को आरक्षण से बाहर करना सही नहीं होगा। केंद्र ने ये भी कहा है कि SC और ST की संवैधानिक सूचियों में बदलाव करने का अधिकार संसद के पास है। अनुच्छेद 341 और 342 के तहत इन सूचियों में संशोधन संसद ही कर सकती है।
तो असली सवाल यही है क्या आरक्षण का लाभ एक ही परिवार या समुदाय के कुछ लोगों तक सीमित रहना चाहिए या फिर आरक्षण के भीतर भी ऐसा सिस्टम होना चाहिए जिससे इसका फायदा सबसे ज्यादा जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे? यही वजह है कि मोहन भागवत का बयान और सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का रुख एक साथ आने के बाद आरक्षण पर बहस फिर गर्म हो गई है। एक तरफ सामाजिक न्याय और ऐतिहासिक भेदभाव को आधार मानने की बात है, तो दूसरी तरफ आरक्षण के लाभ को समाज के भीतर ज्यादा समान तरीके से पहुंचाने की मांग।
रिपोर्ट: कल्पना पाण्डे।