बॉलीवुड (Bollywood) की चकाचौंध के पीछे कभी-कभी एक ऐसा अंधेरा भी होता है जो किसी को भी सिहरन पैदा कर दे। 'आशिकी 2', 'मर्डर 2' और 'जन्नत 2' जैसी फिल्मों के जरिए दूसरों के दर्द और प्यार का एहसास कराने वाली राइटर शगुफ्ता रफीक (Shagufta Rafiq) की कहानी किसी फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं है।
नई दिल्ली। बॉलीवुड (Bollywood) की चकाचौंध के पीछे कभी-कभी एक ऐसा अंधेरा भी होता है जो किसी को भी सिहरन पैदा कर दे। ‘आशिकी 2’, ‘मर्डर 2’ और ‘जन्नत 2’ जैसी फिल्मों के जरिए दूसरों के दर्द और प्यार का एहसास कराने वाली राइटर शगुफ्ता रफीक (Shagufta Rafiq) की कहानी किसी फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं है। 17 साल की उम्र में जिस्म के बाजार की गलियों से शुरू हुआ उनका सफर उन्हें दुबई के बार से होते हुए आखिरकार बॉलीवुड डायरेक्टर महेश भट्ट (Bollywood Director Mahesh Bhatt) के ऑफिस तक ले गया। यह कहानी एक ऐसी महिला के जबरदस्त साहस की है, जिसने दलदल के बीच भी कमल की तरह खिलना सीखा।

शगुफ्ता रफीक (Shagufta Rafiq) ने अपनी कलम से डायरेक्टरों और एक्टरों को भी पीछे छोड़ दिया। महेश भट्ट (Mahesh Bhatt) के कैंप की ‘बैकबोन’ कही जाने वाली शगुफ्ता ने ‘वो लम्हे’, ‘धोखा’, ‘राज’ और ‘आवारापन’ जैसी फिल्मों से बॉलीवुड को एक नई दिशा दी, लेकिन, क्या आप जानते हैं कि इन इमोशनल कहानियों को लिखने वाली कलम असल में आंसुओं और बेइज्जती की स्याही से भरी थी?
शगुफ्ता की जिंदगी का सबसे बड़ा जख्म उनकी आइडेंटिटी है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो आज तक उन्हें नहीं पता कि उनके असली माता-पिता कौन हैं? उन्हें बीते जमाने की एक्ट्रेस अनवरी बेगम ने पाला-पोसा। समाज में कई अफवाहें फैलीं- कुछ ने कहा कि वह अनवरी की पोती हैं, जबकि दूसरों ने कहा कि उन्हें सड़क पर लावारिस पाया गया था। अपनी जड़ों को ढूंढने का यह दर्द आज भी शगुफ्ता की आंखों में झलकता है।
उन्होंने एक बार कहा था कि किसी इंसान के लिए इससे बड़ा कोई दुख नहीं हो सकता कि उसे जन्म देने वाली मां का नाम न पता हो। शगुफ्ता के टीनएज साल कोई सपना नहीं, बल्कि एक बुरा सपना थे। बहुत ज्यादा गरीबी और घर के हालात ने उन्हें ऐसे रास्ते पर धकेल दिया, जिसे कोई अपनी मर्जी से नहीं चुनता। सिर्फ 17 साल की उम्र में उसे प्राइवेट पार्टियों में डांस करने के लिए भेजा जाता था। फिल्मफेयर को दिए एक इंटरव्यू में उसने बताया कि वो पार्टियां किसी कोठे से कम नहीं होती थीं। सभ्य समाज का दिखावा करने वाले ‘इज्जतदार’ लोग वहां औरतों का डांस देखने आते थे।

बता दें, वो दौर शगुफ्ता के लिए न सिर्फ पैसे की तंगी का था, बल्कि दिमागी तौर पर भी तकलीफ देने वाला था। हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ते गए। किसी की सलाह पर शगुफ्ता दुबई चली गईं, जहां उन्होंने बार डांसर का काम करना शुरू कर दिया। उस समय उन्हें एक रात के परफॉर्मेंस के 3000 रुपये मिलते थे। शगुफ्ता बताती है कि वहां वह मर्दों का मनोरंजन करती थी, गाती और नाचती थी ताकि घर का गुजारा चल सके।
इसी बीच उनकी मुलाकात एक 45 साल के आदमी से हुई जिसने उसके डांस के लिए उस पर खूब पैसे लुटाए। वह शगुफ्ता का पहला प्यार थे और भले ही उन्होंने उनसे कभी शादी नहीं की, लेकिन एक इंसान के तौर पर वह उनकी बहुत इज्जत करते थे। वहीं, साल 2002 शगुफ्ता की जिंदगी में एक टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। वह महेश भट्ट से मिलीं। भट्ट की समझदार नजर ने उनके अंदर छिपे दर्द और टैलेंट को पहचान लिया, जो कागज पर बयां होने को बेताब था।
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भट्ट ने उन्हें मौका दिया और शगुफ्ता ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने फिल्म ‘कलयुग’ (2006) के लिए कुछ खास सीन लिखे, जिससे उन्हें पूरी इंडस्ट्री में पहचान मिली। इसके बाद ‘वो लम्हे’ आई, जिसने शगुफ्ता को रातों रात चमकता सितारा बना दिया। इसके बाद शगुफ्ता ने कई ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं। ‘मर्डर 2’, ‘जन्नत 2’, ‘आशिकी 2’ और ‘राज 3’ जैसी फिल्मों ने उन्हें सफलता की उस ऊंचाई पर पहुंचा दिया जिसका सपना हर राइटर देखता है।
शगुफ्ता ने न सिर्फ स्क्रीनप्ले लिखे, बल्कि डायलॉग्स में भी जान डाल दी जो सीधे ऑडियंस से जुड़ गए। बाद में उन्होंने डायरेक्शन में हाथ आजमाया और खुद को एक वर्सेटाइल फिल्ममेकर के तौर पर स्थापित किया। वह बॉलीवुड की एक ‘सक्सेस क्वीन’ बनकर उभरीं।