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Prabhu Ram Aur Hanuman Maitri : “नर बानरहि संग कहु कैसें ” , माता सीता ने जब हनुमान जी से अशोक वाटिका में प्रकट की जिज्ञासा

प्रभु श्री राम और सुग्रीव की मैत्री नर वानर के मैत्री का सबसे अदभुद उदाहरण है। श्रीरामचरित मानस के प्रसंगों के अनुसार,हनुमान जी ने श्री राम और सुग्रीव की भेंट ऋष्यमूक पर्वत पर कराई थी।

By अनूप कुमार 
Updated Date

Prabhu Ram Aur Hanuman Maitri : प्रभु श्री राम और सुग्रीव की मैत्री नर वानर के मैत्री का सबसे अदभुद उदाहरण है। श्रीरामचरित मानस के प्रसंगों के अनुसार,हनुमान जी ने श्री राम और सुग्रीव की भेंट ऋष्यमूक पर्वत पर कराई थी। मित्रता को पक्का करने के लिए हनुमान जी ने अग्नि प्रज्वलित की और दोनों ने अग्नि को साक्षी मानकर एक-दूसरे का साथ निभाने की शपथ ली।
यह प्रसिद्ध चौपाई गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के सुंदरकांड से ली गई है। इसमें माता सीता, हनुमान जी से भगवान श्री राम और वानरों के मिलन के बारे में जिज्ञासा प्रकट करती हैं।

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शुद्ध चौपाई इस प्रकार है:”नर बानरहि संग कहु कैसें ”

अर्थ
जब हनुमान जी लंका में अशोक वाटिका में माता सीता से मिलते हैं और उन्हें श्री राम की अंगूठी देते हैं, तब माता सीता को विश्वास होता है कि ये श्री राम के ही दूत हैं। इसके बाद उनके मन में यह प्रश्न उठता है कि श्री राम (मनुष्य) और वानरों का साथ कैसे हुआ।

प्रश्न: माता सीता ने पूछा कि मनुष्यों और वानरों का मेल कैसे हुआ?

उत्तर: तब हनुमान जी ने वह सारी कथा विस्तार से सुनाई कि किस प्रकार ऋष्यमूक पर्वत पर श्री राम और सुग्रीव की मित्रता हुई और वानर सेना उनके साथ जुड़ी।

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